Aniruddh Singh
12 Jan 2026
मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जुलाई महीने में विदेशी मुद्रा बाजार (फॉरेक्स मार्केट) में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया और कुल 2.54 अरब डॉलर (लगभग 21,000 करोड़ रुपए) की शुद्ध बिक्री की। इस दौरान केंद्रीय बैंक ने कोई खरीदारी नहीं की। यह जानकारी आरबीआई की मासिक बुलेटिन रिपोर्ट में दी गई। जून महीने में आरबीआई ने इससे भी ज्यादा 3.6 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की थी। जुलाई में रुपए में तेज उतार-चढ़ाव और डॉलर की मजबूती को देखते हुए यह कदम उठाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई के अंत तक आरबीआई की नेट आउटस्टैंडिंग फॉरवर्ड सेल 57.85 अरब डॉलर रही। यह आंकड़ा जून के अंत में 60.4 अरब डॉलर था यानी एक महीने में इसमें हल्की कमी आई।
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केंद्रीय बैंक का यह हस्तक्षेप सीधे तौर पर रुपए में स्थिरता बनाए रखने और विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए किया गया। जब बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है, तो रुपया कमजोर होने लगता है। ऐसे में आरबीआई डॉलर बेचकर बाजार में आपूर्ति बढ़ाता है, जिससे रुपए पर दबाव कम होता है। जुलाई महीने में भारतीय रुपया 2% तक गिर गया, जो सितंबर 2022 के बाद से सबसे बड़ी मासिक गिरावट है। इस गिरावट का मुख्य कारण वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और अमेरिका की ओर से नए टैरिफ तथा वीजा फीस में बढ़ोतरी से जुड़ी चिंताएं थीं। रुपए की कीमत घटने से भारत के आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे महंगाई पर असर पड़ सकता है। इसे रोकने के लिए आरबीआई को मजबूरन बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई में डॉलर के मुकाबले रुपए का स्तर लगातार दबाव में रहा और यह 88.69 प्रति डॉलर के आसपास बंद हुआ। यह स्थिरता इसलिए बनी रही क्योंकि आरबीआई ने समय-समय पर सीधे हस्तक्षेप करके रुपए को और ज्यादा गिरने से बचाया। अगर यह कदम नहीं उठाया जाता, तो रुपया और कमजोर हो सकता था। केंद्रीय बैंक दो तरह से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। पहला, स्पॉट मार्केट में, जहां तत्काल लेन-देन होता है। दूसरा, फॉरवर्ड मार्केट में, जिसमें भविष्य की तारीखों के लिए सौदे तय किए जाते हैं। जुलाई में आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में सीधे डॉलर बेचे, जबकि फॉरवर्ड सेल में भी इसकी हिस्सेदारी 57.85 अरब डॉलर रही।
जुलाई में रुपए की कमजोरी के पीछे कई कारण थे। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों के चलते डॉलर मजबूत हुआ, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा भारत के कुछ उत्पादों पर बढ़ाए गए आयात शुल्क और वीजा फीस में बढ़ोतरी ने भी विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। नतीजतन, विदेशी निवेशकों ने भारतीय संपत्तियों से पैसा निकालना शुरू कर दिया। आरबीआई का उद्देश्य रुपए की कीमत को किसी विशेष स्तर पर बनाए रखना नहीं है, बल्कि बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है। जब रुपये की कीमत में अचानक तेज बदलाव होता है, तो यह विदेशी व्यापार और निवेशकों के भरोसे को प्रभावित करता है।
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यही वजह है, आरबीआई समय-समय पर डॉलर बेचकर या खरीदकर स्थिरता बनाए रखने की कोशिश करता है। कुल मिलाकर, जुलाई का महीना भारतीय मुद्रा रुपए के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। रुपए की 2% गिरावट ने यह संकेत दिया कि वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है। आने वाले महीनों में यदि अमेरिकी नीतियों और वैश्विक परिस्थितियों में सुधार नहीं होता, तो आरबीआई को एक बार फिर बड़े स्तर पर हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। फिलहाल, 88.69 प्रति डॉलर का स्तर यह दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक की त्वरित कार्रवाई से रुपए को और बड़ी गिरावट से बचा लिया गया है। अगर आरबीआई ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो और बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती थी।