Wheat E-Auctionगेहूं की दोबारा ई-नीलामी शुरू होने से बाजार में बढ़ी आवक, कीमतों में गिरावट से मिलर्स और व्यापारी परेशान

नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा खुले बाजार बिक्री योजना (ओपन मार्केट सेल स्कीम-ओएमएसएस) के तहत गेहूं की ई-नीलामी को दोबारा शुरू करने के फैसले का सीधा असर गेहूं की बाजार कीमतों पर पड़ा है। पहले कमजोर मांग के कारण इस ई-नीलामी को रोक दिया गया था, लेकिन अब इसके फिर से शुरू होते ही बाजार में गेहूं की आपूर्ति बढ़ गई है। इससे कीमतों में गिरावट आई है, जिसका सबसे ज्यादा असर आटा मिलर्स और बड़े भंडारण करने वाले व्यापारियों पर देखने को मिल रहा है। खाद्य निगम (एफसीआई) के पास मौजूद अतिरिक्त गेहूं को बाजार में बेचे जाने से खुले बाजार में पहले से मौजूद गेहूं की उपलब्धता और बढ़ गई है। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे गेहूं की कीमतों पर और दबाव बनेगा। इस स्थिति का एक बड़ा नतीजा यह हो सकता है कि निजी व्यापारी और मिलर्स आगामी विपणन सत्र 2026-27, जो 1 अप्रैल से शुरू होगा, उसमें किसानों से गेहूं खरीदने में रुचि कम दिखाएं। इसकी वजह यह है कि जब बाजार में कीमतें पहले से ही कम हों, तो ऊंची लागत पर गेहूं खरीदकर उसे लंबे समय तक रखना घाटे का सौदा बन सकता है।
इस वजह से घाटे का सौदा बना व्यापार
आमतौर पर निजी खरीदार विपणन सत्र की शुरुआत में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर गेहूं खरीदते हैं, जो फिलहाल 2,425 रुपए प्रति क्विंटल है। इसके साथ भंडारण, ब्याज, परिवहन और अन्य खर्च जोड़ दिए जाएं तो लगभग 650 रुपए प्रति क्विंटल का अतिरिक्त बोझ पहले दस महीनों में पड़ता है। जब बाजार कीमतें इस कुल लागत के आसपास या उससे नीचे आ जाती हैं, तो स्टॉक रखने वाले व्यापारियों पर सीधा आर्थिक दबाव बनता है। रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में गेहूं की कीमतें करीब 100 रुपए प्रति क्विंटल गिरकर 2,750 से 2,800 रुपए प्रति क्विंटल के दायरे में आ गई हैं। इससे आटा मिलर्स और स्टॉकिस्ट्स की मुनाफाखोरी पर असर पड़ा है। वहीं ओएमएसएस के तहत थोक खरीदारों, जैसे मिलर्स, के लिए सरकार ने 2025-26 के लिए गेहूं की कीमत 2,550 रुपए प्रति क्विंटल तय की है, जिसमें पंजाब से ढुलाई का खर्च शामिल नहीं है। यह दर भी खुले बाजार की कीमतों को नीचे खींचने का काम कर रही है।
गेहूं में सुस्ती की बड़ी वजह रिकॉर्ड उत्पादन
इस साल गेहूं के बाजार में सुस्ती की एक और बड़ी वजह रिकॉर्ड उत्पादन है। देश में गेहूं का उत्पादन 117 मिलियन टन से अधिक रहा है, जबकि अनुमानित मांग करीब 108 मिलियन टन की है। यानी मांग की तुलना में आपूर्ति ज्यादा है और खुले बाजार में फसल की उपलब्धता पर्याप्त बनी हुई है। ऐसे में कीमतों का दबाव में रहना स्वाभाविक माना जा रहा है। मिलर्स संगठनों का कहना है कि सरकार की ओर से स्टॉक उतारने की नीति में स्पष्टता की कमी से बाजार में अस्थिरता बढ़ती है। ओएमएसएस का उद्देश्य महंगाई पर नियंत्रण के लिए सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध कराना था, लेकिन बार-बार नीति में बदलाव से व्यापारियों और उद्योग के लिए योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार, नवंबर और दिसंबर की शुरुआत में एफसीआई ने अपने भंडार से केवल 0.15 मिलियन टन गेहूं ही बाजार में उतारा, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए लक्ष्य 3 मिलियन टन का था। इससे यह साफ होता है कि सरकारी बिक्री की रणनीति और बाजार पर उसके प्रभाव को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।



















