नई दिल्ली। इंडियन माइक्रो-फर्टिलाइजर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत अधिसूचित सभी उर्वरकों पर समान रूप से 5 प्रतिशत जीएसटी लागू किया जाए, अतिरिक्त जीएसटी क्रेडिट का रिफंड तेज़ी से किया जाए और कारोबार को आसान बनाने के लिए एकीकृत लाइसेंस प्रणाली लागू की जाए। उद्योग संगठन ने जीएसटी 2.0 को इस क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सुधार माना है, खासकर उन उत्पादों के लिए जिन पर पहले 12 प्रतिशत जीएसटी लगता था और जिसे घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया। हालांकि, इसके बावजूद कंपनियों को अब एक नई समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिसे ह्यइनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चरह्ण कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि माइक्रो-फटिर्लाइजर बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और सेवाओं पर जीएसटी की दर अधिक है, जबकि तैयार उत्पाद पर टैक्स कम लगता है।
कच्चे माल-सेवाओं पर जीएसटी की दर अधिक
इस स्थिति में कंपनियों के पास अतिरिक्त इनपुट टैक्स क्रेडिट जमा हो जाता है, जिसका तुरंत इस्तेमाल या रिफंड नहीं हो पाता। इसका सीधा असर कंपनियों की कायर्शील पूंजी पर पड़ता है। पैसा टैक्स क्रेडिट के रूप में फंसा रहने से उद्योग की नकदी स्थिति कमजोर होती है। एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल मिर्चंदानी के अनुसार, यह स्थिति विशेष रूप से उर्वरक जैसे नियंत्रित और कीमत-संवेदनशील क्षेत्रों के लिए मुश्किल पैदा करती है। इसलिए उद्योग की मांग है कि अतिरिक्त जीएसटी क्रेडिट के रिफंड के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध व्यवस्था बनाई जाए। उनका मानना है कि अगर रिफंड जल्दी मिले, तो कंपनियां अपनी पूंजी का बेहतर इस्तेमाल कर पाएंगी, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता सुधरेगी, उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और किसानों तक बेहतर तरीके से पहुंच बनाई जा सकेगी। इसके साथ ही उद्योग संगठन ने सभी उर्वरकों पर एक समान 5 प्रतिशत जीएसटी लागू करने की मांग की है।
अलग-अलग दरों की वजह से पैदा होती है असमानता
उन्होंने कहा अलग-अलग कर दरों के कारण वर्गीकरण को लेकर विवाद होते हैं और बाजार में असमानता पैदा होती है। यदि सभी उर्वरकों पर एक ही दर लागू हो, तो प्रतिस्पर्धा का माहौल समान रहेगा और बिना कर संबंधी विकृतियों के नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। उद्योग ने कारोबार सुगमता को लेकर वन नेशन, वन लाइसेंस प्रणाली लागू करने की भी मांग की है। वतर्मान में कई राज्यों में अलग-अलग और कभी-कभी जिलावार लाइसेंस लेने पड़ते हैं, जिससे दस्तावेज़ी दोहराव, देरी और अनावश्यक अनुपालन लागत बढ़ जाती है। संगठन का सुझाव है कि सभी लाइसेंस से जुड़े दस्तावेज़ों के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल प्रणाली बनाई जाए, जिसे सभी राज्य सरकारें देख सकें। इससे सत्यापन आसान होगा और विपणन की मंजूरी भी जल्दी मिल सकेगी। कुल मिलाकर, इस खबर का अर्थ यह है कि माइक्रो-फटिर्लाइज़र उद्योग कर ढांचे और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार चाहता है ताकि कंपनियों पर वित्तीय दबाव कम हो, उत्पादन और निवेश बढ़े और अंतत: किसानों को समय पर और अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद मिल सकें। बजट से पहले उठाई गई ये मांगें कृषि और उद्योग दोनों के हितों से जुड़ी हुई हैं।