भारत पर ट्रंप के नए प्रतिबंधों का असर :रिफाइनरी कंपनियों ने रोका रूसी तेल का ऑर्डर, अमेरिका बना नया सप्लायर

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रिफाइनरी कंपनियों ने रोका रूसी तेल का ऑर्डर, अमेरिका बना नया सप्लायर
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। अमेरिकी दबाव के बीच भारत धीरे-धीरे रूस से कच्चे तेल की खरीदारी को कम कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर बैन का असर अब भारतीय रिफाइनरियों पर भी दिखने लगा है। रूसी तेल की खरीद के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने कोई नया ऑर्डर नहीं दिया गया है। ऐसे में वे सरकार और तेल सप्लायर्स की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रही हैं। पिछले कुछ सालों में भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा किया था, लेकिन अब इस नीति पर फिलहाल विराम लग गया है।

    अमेरिकी तेल पर बढ़ा भरोसा

    रूस से तेल आयात में कमी के बीच भारत ने अब अमेरिका से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2025 में अमेरिका से आयात 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। भारत के कई बड़े रिफाइनरी हब जैसे रिफाइनर इंडियन ऑयल, एचपीसीएल और बीपीसीएल ने अमेरिका से सप्लाई बढ़ाने के लिए नई डील्स की हैं।

    कुछ रिफाइनरियां अपनी कच्चे तेल की जरूरतें पूरी करने के लिए खुले बाजार (स्पॉट मार्केट) का रुख कर रही हैं। सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल ने तेल खरीदने के लिए एक टेंडर जारी किया है। वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज ने खुले बाजार से तेल की खरीद बढ़ा दी है।

    रूस से आयात घटकर 35-40 फीसदी तक आया

    27 अक्टूबर 2025 तक भारत अमेरिका से प्रतिदिन 5.4 लाख बैरल कच्चा तेल आयात कर रहा है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। एक बैरल में लगभग 159 लीटर तेल होता है। हालांकि, भारत के कुल तेल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी अभी भी 5 से 7 प्रतिशत के बीच है। पहले भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत रूस था, जो कुल आयात का 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा आपूर्ति करता था। लेकिन हाल के महीनों में अमेरिकी तेल की खरीद में तेजी आने से रूस की हिस्सेदारी में गिरावट आई है।

    अक्टूबर के अंत तक भारत का अमेरिकी आयात 5.75 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है, जबकि नवंबर में यह घटकर 4 से 4.5 लाख बैरल रहने की संभावना है। पहले भारत अमेरिका से औसतन 3 लाख बैरल ही मंगाता था। इसके बावजूद, रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है, जबकि इराक दूसरे और सऊदी अरब तीसरे स्थान पर हैं।

    रूसी तेल क्यों था सस्ता सौदा

    रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से रूस ने भारत को भारी छूट के साथ तेल बेचा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली। भारत को इससे न सिर्फ सस्ता तेल मिला बल्कि रुपए में भुगतान जैसी सुविधाओं ने भी आर्थिक संतुलन बनाए रखा। अब, ट्रंप प्रशासन की सख्ती के बाद इस ‘सस्ते सौदे’ पर खतरा मंडरा रहा है।

    ट्रंप की नीति और भारत की मुश्किलें

    ट्रंप प्रशासन ने यह साफ किया है कि, रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाए जाएंगे। अमेरिका का कहना है कि, रूस की तेल बिक्री से युद्ध को आर्थिक मदद मिल रही है। भारत, जो रूस और अमेरिका दोनों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध रखता है, अब संतुलन साधने की कोशिश में है। भारत की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि, हम हर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध का पालन करते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे।

    आर्थिक असर और पेट्रोलियम बाजार पर प्रभाव

    रूस से आयात घटने का सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। अगर भारत ने लंबे समय तक रूसी तेल से दूरी बनाए रखी, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। भारत रोजाना करीब 60 लाख डॉलर तक का फायदा सस्ते रूसी तेल से उठा रहा था, ऐसे में नुकसान की संभावना भी उतनी ही बड़ी है।

    आगे की रणनीति क्या होगी?

    भारत अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए अमेरिका, इराक, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों की ओर रुख कर रहा है। साथ ही, सरकार नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू तेल उत्पादन को बढ़ाने पर भी जोर दे रही है ताकि विदेशी निर्भरता घटाई जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि, आने वाले महीनों में भारत को ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है।

    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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