केंद्र 75% के स्तर पर लाना चाहता है सभी पीएसयू में अपना स्टेक, साल के अंत तक पूरी होगी आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के विनिवेश कार्यक्रम के तहत आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआईपीएएम) के के अनुसार योग्य बोलीदाताओं (क्यूआईबी) ने ड्यू डिलिजेंस की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली है। उनके सभी सवालों के जवाब दिए जा चुके हैं और उन्हें आवश्यक डेटा तथा विवरण उपलब्ध करा दिए गए हैं। यह पूरी प्रक्रिया सितंबर के अंत तक पूरी हो जाएगी और साल के अंत तक इस विनिवेश से जुड़ी सभी जरूरी औपचारिकताएं भी पूरी कर ली जाएंगी। इसके साथ ही सरकार उन पीएसयू कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को 90% या उससे कम करना चाहती है, जहां वर्तमान में उसकी हिस्सेदारी 90% से अधिक है। वहीं, जिन कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 75% से 90% के बीच है, वहां इसे घटाकर 75% तक लाने की योजना है, ताकि शेयर बाजार में पर्याप्त फ्लोट (यानी आम निवेशकों के लिए उपलब्ध शेयर) सुनिश्चित किया जा सके।
47,000 करोड़ की संपत्ति के मौद्रिकरण की योजना
निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआईपीएएम) के सचिव अरुणीश चावला ने बताया सरकार का लक्ष्य मौजूदा वित्तीय वर्ष में 47,000 करोड़ रुपए की संपत्ति के मौद्रिकरण (एसेट मोनीटाइजेशन) का है। पहली तिमाही में लगभग 22,000 करोड़ रुपए का लक्ष्य पहले ही हासिल कर लिया गया है। उन्होंने कहा शेष लक्ष्य को पूरा करने के लिए विभाग लगातार प्रयास करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि विभाग इस वर्ष उन सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) की समीक्षा कर रहा है जो सेबी के नए ढ़ांचे के तहत स्वैच्छिक डीलिस्टिंग प्रक्रिया के योग्य हैं। सरकार का उद्देश्य उन कंपनियों में हिस्सेदारी को 90% या उससे कम करना है जहां वर्तमान में उसकी हिस्सेदारी 90% से अधिक है। वहीं, जिन कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 75% से 90% के बीच है, वहां इसे घटाकर 75% तक लाने की योजना है, ताकि शेयर बाजार में पर्याप्त फ्लोट (यानी आम निवेशकों के लिए उपलब्ध शेयर) सुनिश्चित किया जा सके।
बैंक में सरकार व एलआईसी का हिस्सा 95 फीसदी
आईडीबीआई बैंक में इस समय सरकार और एलआईसी की संयुक्त हिस्सेदारी 95% है। मौजूदा विनिवेश कार्यक्रम के तहत 60.72% हिस्सेदारी बिक्री के लिए तय की गई है। यह कदम सरकार की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत सार्वजनिक उपक्रमों को अधिक प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और निवेशक-हितैषी बनाया जा रहा है। एलआईसी में और हिस्सेदारी बेचने के सवाल पर चावला ने कहा कि डीआईपीएएम, मर्चेंट बैंकरों और एलआईसी ने इस विषय पर निर्णय लेने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समूह बनाया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिस्सेदारी बिक्री का निर्णय बाज़ार की परिस्थितियों और निवेशकों की रुचि को ध्यान में रखकर ही लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा सार्वजनिक उपक्रमों को लाभांश नीति के मामले में रोल मॉडल बनाया जाना चाहिए, ताकि आम निवेशक उनमें और अधिक भरोसा कर सकें और उनकी संपत्ति वृद्धि में भागीदार बनें। सरकार चाहती है कि साधारण निवेशक भी इन कंपनियों का हिस्सा बनें और सार्वजनिक उपक्रमों की सफलता से लाभान्वित हों।












