नाभि में इत्र लगाकर भगवान कुबेर की आराधना: आश्रम की है ये अनूठी परंपरा

कुंडेश्वर महादेव मंदिर में कुबेर की प्राचीन प्रतिमा के दर्शनों का है विशेष महत्व।
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नाभि में इत्र लगाकर भगवान कुबेर की आराधना: आश्रम की है ये अनूठी परंपरा
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    उज्जैन। महर्षि सांदीपनि आश्रम स्थित कुंडेश्वर महादेव मंदिर में धनतेरस के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलेगी। भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली के रूप में प्रसिद्ध इस पावन धाम में कुबेर देव की दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमा के दर्शन के लिए देशभर से भक्त यहां हर साल भारी मात्रा मे आते है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कुबेर की नाभि में इत्र चढ़ाने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    गर्भगृह में स्थापित

    कुंडेश्वर महादेव मंदिरए महर्षि सांदीपनि आश्रम परिसर के उन 84 महादेव मंदिरों में से एक है, जिसे 40वें स्थान पर माना जाता है। इस मंदिर का विशेष आकर्षण है गर्भगृह में स्थापित भगवान कुबेर की प्राचीन मूर्ति। लगभग 1100 वर्ष पुरानी यह प्रतिमा आकर्षक कलात्मकता के साथ-साथ अध्यात्मिक ऊर्जा का भी प्रतीक मानी जाती है। प्रतिमा में कुबेर के एक हाथ में सोमपात्र है, दूसरा हाथ वरमुद्रा में, कंधे पर धन की पोटली और मुखमंडल पर तेज। उभरी हुई तोंद, तीखी नाक और गहनों से सुसज्जित शरीर इस प्रतिमा को अत्यंत विशिष्ट बनाते हैं। गर्भगृह में भगवान वामन देव, बालाजी और भगवान नारायण की भी दुर्लभ प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो इस स्थल को और भी पवित्र बनाती हैं।

    मंदिर का शिखर

    मंदिर के शिखर के भीतर स्थापित श्री यंत्र इसे तांत्रिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है। माना जाता है कि यह यंत्र भक्तों को मानसिक शांति, समृद्धि और साधना में सफलता प्रदान करता है।

    तोंद पर हाथ फेरकर करते हैं मनोकामना

    धनतेरस से लेकर दीपावली तक यहां विशेष पूजन होता है। श्रद्धालु कुबेर की तोंद पर हाथ फेरकर अपनी मनोकामनाएं प्रकट करते हैं और उनकी नाभि में इत्र लगाते हैं। इसके बाद मिष्ठान और अनार का भोग चढ़ाया जाता है, जिसे धन के देवता को अर्पण करने की परंपरा से जोड़ा गया है। ऐसी मान्यता है कि इससे कुबेर प्रसन्न होकर धन-धान्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

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    जुड़ी है श्रीकृष्ण की कथा

    इस प्रतिमा से जुड़ी एक अत्यंत रोचक मान्यता भी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में अपनी शिक्षा पूर्ण की थी, तब गुरु दक्षिणा देने के लिए वे अपने गुरु के मृत पुत्र को यमलोक से वापस लाए। इसी अवसर पर भगवान नारायण के सेवक कुबेर स्वयं धन लेकर आश्रम आए थे। गुरु दक्षिणा के रूप में कुबेर का खजाना देने के पश्चात कुबेर वहीं आश्रम में विराजमान हो गए। विदाई के समय गुरु ने वह धन कुबेर को लौटा दिया और श्रीकृष्ण को राजा बनने का आशीर्वाद प्रदान किया।

    दीपावली तक चलता है उत्सव

    हर वर्ष धनतेरस के दिन यहां विशेष पूजन-अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है, जो दीपावली तक चलता है। इस दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुबेर की पूजा करने से पूरे वर्ष आर्थिक संकट नहीं आता और घर में लक्ष्मी का वास होता है।

    इतिहास, आस्था और संस्कृति का अनोखा संगम

    कुंडेश्वर महादेव मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म का भी अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण की शिक्षा से जुड़ा यह स्थल आज भी उतना ही प्रासंगिक और श्रद्धा का केंद्र है जितना हजारों वर्ष पहले था।

    धनतेरस और दीपावली जैसे पर्वों पर यह स्थान उज्जैन के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक प्रमुख आकर्षण बन चुका है।

    Aditi Rawat
    By Aditi Rawat

    अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी) | एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारिय...Read More

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