Naresh Bhagoria
29 Jan 2026
भोपाल। UGC के नए इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में उबाल लगातार बढ़ता जा रहा है। छात्रों और शिक्षकों के विरोध के बीच अब यह मुद्दा सियासी बहस के केंद्र में भी आ गया है। इसी कड़ी में संसदीय स्थायी समिति के चेयरमैन और कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने सामने आकर स्थिति स्पष्ट की है।
दिग्विजय सिंह ने फेसबुक पोस्ट के जरिए साफ कहा कि संसदीय समिति ने न तो ‘फर्जी शिकायत पर सजा’ वाले प्रावधान को हटाने की सिफारिश की थी और न ही सामान्य वर्ग के छात्रों को नियमों से बाहर रखने का सुझाव दिया था। उनके मुताबिक, ये दोनों फैसले पूरी तरह UGC के अपने स्तर पर लिए गए हैं। दिग्विजय सिंह ने यह भी बताया कि समिति के दो प्रमुख सुझावों को UGC ने स्वीकार नहीं किया। पहला सुझाव था इक्विटी कमेटियों में SC, ST और OBC की 50% से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना। दूसरा, भेदभाव के ठोस और विस्तृत उदाहरणों को नियमों में शामिल करना। इन दोनों प्रस्तावों को नजरअंदाज किए जाने से छात्रों के बीच असमंजस और नाराजगी बढ़ी है।
विवाद की एक बड़ी वजह यह भी बनी कि नए नियमों में फर्जी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटा दिया गया। कई छात्र संगठनों का कहना है कि स्पष्ट परिभाषा के बिना यह स्थिति गलत आरोपों की आशंका को और बढ़ा देती है। उपलब्ध रिपोर्ट्स के अनुसार, UGC ने अंतिम रेगुलेशन में यह प्रावधान अपने स्तर पर हटाया, जबकि यह समिति की सिफारिशों का हिस्सा नहीं था।
दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगर UGC ने भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा और उसके विस्तृत उदाहरण नियमों में शामिल कर दिए होते, तो ‘फर्जी केस’ का डर ही पैदा नहीं होता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रों का गुस्सा संसदीय समिति पर नहीं, बल्कि UGC के फैसलों पर केंद्रित है।
दिग्विजय सिंह के अनुसार, मौजूदा स्थिति में जिम्मेदारी अब शिक्षा मंत्रालय की है। मंत्रालय को आगे आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और छात्रों के बीच फैल रहे भ्रम को दूर करना चाहिए, ताकि कैंपस में भरोसे का माहौल बन सके।
गौरतलब है कि UGC ने फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और रोहित वेमुला व पायल तड़वी के परिवारों की मांगों के बाद इक्विटी रेगुलेशन का ड्राफ्ट जारी किया था। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना था।
दिसंबर 2025 में संसदीय समिति ने इस ड्राफ्ट की समीक्षा की और सर्वसम्मति से अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में OBC, दिव्यांगता और भेदभाव की विस्तृत परिभाषा को नियमों में शामिल करने की स्पष्ट सिफारिशें की गई थीं।
जनवरी 2026 में जारी किए गए अंतिम नियमों ने ही पूरे विवाद को जन्म दिया। देशभर के छात्र संगठनों का कहना है कि नए प्रावधान भ्रमित करने वाले हैं और कुछ हिस्से दमनकारी भी प्रतीत होते हैं। कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। हालांकि UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।