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Vijay S. Gaur
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इंदौर। कभी शादी से पहले कुंडली मिलान, शुभ मुहूर्त और विवाह खर्चों पर चर्चा होती थी, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। आधुनिक शहरों में शादी से पहले पंडित की जगह वकील से कानूनी सलाह लेना नया ट्रेंड बनता जा रहा है। इसकी वजह है,शादी के बाद टूटते रिश्ते और उनके साथ खड़े होने वाले कानूनी मामलों का डर।
आज के युवा, खासकर होने वाले दूल्हे और उनके परिवार, शादी को सिर्फ भावनात्मक रिश्ता नहीं, बल्कि एक संभावित कानूनी जोखिम के रूप में देखने लगे हैं। आशंका यह है कि अगर भविष्य में वैवाहिक संबंध बिगड़े, तो दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और भरण-पोषण जैसे गंभीर मामलों में फंसना पड़ सकता है। इसी डर के चलते अब शादी की तैयारियों में लीगल कंसलटेशन भी शामिल हो गया है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार पहले लोग तब वकील के पास पहुंचते थे, जब रिश्ता टूटने की कगार पर होता था। अब तस्वीर उलट है। युवा पीढ़ी कानून को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो गई है। वे पहले ही जान लेना चाहते हैं कि पति-पत्नी के अधिकार क्या हैं, किन हालात में कौन-सी धाराएं लग सकती हैं और उनसे बचाव कैसे संभव है।
परिवार इसे एक तरह का लीगल सेफ्टी प्लान मानकर चल रहे हैं, ताकि भविष्य में विवाद की स्थिति आए तो खुद को कानूनी रूप से सुरक्षित रखा जा सके।
इस पूरे ट्रेंड के केंद्र में दहेज प्रताड़ना से जुड़ा कानून, खासतौर पर धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) है। भले ही यह कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया हो, लेकिन इसके दुरुपयोग की चर्चाओं ने कई परिवारों में डर पैदा कर दिया है।
लड़के और उनके परिजनों की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि कहीं भविष्य में पत्नी उनके खिलाफ झूठा मामला दर्ज न करा दे। सवाल यह भी उठता है कि शादी में दिए गए उपहार, नकद या खर्च कहीं बाद में दहेज के रूप में तो नहीं गिने जाएंगे। चिंता सिर्फ पति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि माता-पिता, भाई-बहन और दूर के रिश्तेदारों तक पर मुकदमे का खतरा मंडराने लगता है।
आज की शादियां भव्यता की दौड़ में शामिल हो चुकी हैं। डेस्टिनेशन वेडिंग, फाइव-स्टार होटल, महंगी सजावट और हाई-एंड कैटरिंग पर दोनों परिवार मिलकर लाखों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन यही साझा खर्च विवाद की स्थिति में कानूनी पेंच बन जाता है।
कई मामलों में लड़की पक्ष द्वारा की गई बैंक ट्रांसफर को बाद में दहेज बताकर केस में शामिल कर लिया गया। कहीं होटल और कैटरिंग के संयुक्त भुगतान को दबाव में दिया गया पैसा बताकर मुकदमा दर्ज कराया गया। भले ही बाद में बैंक स्टेटमेंट और चैट से सच्चाई सामने आ जाए, लेकिन तब तक परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है।
कानूनी विशेषज्ञ अब साफ तौर पर सलाह दे रहे हैं कि हर लेन-देन डिजिटल माध्यम से हो और नकद से पूरी तरह बचा जाए। बैंक ट्रांसफर करते समय यह स्पष्ट लिखा जाए कि यह शादी का संयुक्त खर्च है। वॉट्सएप या अन्य चैट में भी सहमति और खर्च का उद्देश्य साफ दर्ज होना चाहिए। यही डिजिटल सबूत भविष्य में कानूनी सुरक्षा बन सकता है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि शादी से पहले कानूनी सलाह लेने वालों में लड़के पक्ष की संख्या कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में यह धारणा बनी हुई है कि वैवाहिक कानून महिलाओं के पक्ष में हैं, इसलिए वे पहले से कानूनी तैयारी को जरूरी नहीं समझतीं।