Manisha Dhanwani
29 Jan 2026
सुर्खियों की दुनिया में कभी-कभी एक बयान, एक मंच या एक परफॉर्मेंस पूरी कहानी का रुख बदल देती है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं अभिनेता रणवीर सिंह, जिनके खिलाफ कांतारा फिल्म से जुड़ी दैव परंपरा के कथित अपमान को लेकर FIR दर्ज की गई है। मामला सिर्फ एक कलाकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
तटीय कर्नाटक की दैव परंपराएं केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि वहां के सामाजिक जीवन, प्रकृति और सामुदायिक विश्वास से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में किसी सार्वजनिक मंच पर इन परंपराओं से जुड़ा मजाक स्थानीय समाज में सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि श्रद्धा का अपमान माना जाता है। यही वजह है कि यह विवाद तेजी से कानूनी और सामाजिक बहस में बदल गया है।
रणवीर सिंह पर आरोप है कि, उन्होंने एक सार्वजनिक मंच पर मजाकिया अंदाज में अजीब हाव-भाव और एक्सप्रेशन बनाए और उनकी तुलना फिल्म कांतारा में दिखाई गई दैव परंपरा से की। शिकायत में कहा गया है कि, उन्होंने चेहरे के भद्दे हाव-भाव बनाते हुए उसे चावुंडी दैव से जोड़कर प्रस्तुत किया, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
बेंगलुरु के वकील प्रशांत मेथल की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि इस प्रस्तुति से तटीय कर्नाटक की पवित्र दैव परंपरा का अपमान हुआ है और हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है।
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विषय |
विवरण |
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शिकायतकर्ता |
वकील प्रशांत मेथल (बेंगलुरु) |
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आरोप |
धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना |
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धाराएं |
भारतीय न्याय संहिता की धारा 196, 299, 302 |
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स्थिति |
FIR दर्ज |
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मामला |
न्यायिक प्रक्रिया में |
कांतारा सिर्फ एक फिल्म नहीं रही, बल्कि उसने 21वीं सदी के दर्शकों को लोक आस्था और दैवीय परंपराओं से दोबारा जोड़ा। यह परंपराएं किसी धार्मिक ग्रंथ से नहीं निकलीं, बल्कि खेतों की मिट्टी, जंगलों, नदियों और समुदायों की स्मृतियों से बनी हैं।
इन लोक मान्यताओं को पीढ़ियों की कहानियों, जीवन संघर्षों और विश्वासों ने गढ़ा है। यही कारण है कि, कांतारा में दिखाई गई दैव परंपराओं को लोगों ने सिर्फ फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखा।
कांतारा में दिखाए गए गुलिगा दैव और पंजुरली दैव को कई लोगों ने उत्तर भारत के रक्षक देवताओं (डीह बाबा, तेजाजी, गोगाजी, पाबूजी) से जोड़कर देखा। इसी परंपरा में चावुंडी दैव को एक स्त्री दैव के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
फिल्म के अनुसार चावुंडी, भैरव की बहन हैं और एक उग्र स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं। यहीं से यह विवाद और गहराता है, क्योंकि चावुंडी दैव को सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि जीवित न्यायकारी शक्ति के रूप में माना जाता है।
चावुंडी दैव कर्नाटक के तुलु नाडु क्षेत्र की प्राचीन भूत कोला परंपरा से जुड़ी रक्षक दैव आत्मा मानी जाती हैं। वे लोककथाओं, आस्था और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ी मान्यताओं का प्रतीक हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार चावुंडी दैव-
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पहलू |
विवरण |
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परंपरा |
भूत कोला (दैव आराधना) |
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क्षेत्र |
तुलु नाडु (उडुपी, दक्षिण कन्नड़) |
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स्वरूप |
दैवीय नृत्य अनुष्ठान |
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माध्यम |
प्रशिक्षित कलाकार |
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उद्देश्य |
न्याय, संरक्षण, आशीर्वाद |
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समय |
रातभर चलने वाला अनुष्ठान |
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तत्व |
ढोल-नगाड़े, अग्नि, संगीत, विशेष वेशभूषा |
भूत कोला में कलाकार समाधि जैसी अवस्था में दैव का रूप धारण करते हैं और समुदाय को संदेश, न्याय और आशीर्वाद देते हैं।
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विषय |
चावुंडी दैव |
चामुंडी देवी |
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परंपरा |
लोक दैव परंपरा |
वैदिक-पौराणिक |
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क्षेत्र |
तुलु नाडु |
पूरे भारत |
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पूजा |
भूत कोला अनुष्ठान |
मंदिर पूजा |
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स्वरूप |
रक्षक दैव आत्मा |
देवी दुर्गा का उग्र रूप |
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पहचान |
लोक आस्था |
ग्रंथ आधारित परंपरा |
नाम और उग्र स्त्री शक्ति के प्रतीक समान हो सकते हैं, लेकिन दोनों की आध्यात्मिक परंपराएं और सांस्कृतिक संदर्भ अलग हैं।
स्थानीय समाज में दैव परंपरा को परफॉर्मेंस या रोल नहीं, बल्कि जीवित आस्था माना जाता है। यही कारण है कि जब इसे मंचीय मजाक या अभिनय के रूप में पेश किया जाता है, तो यह सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि श्रद्धा का अपमान माना जाता है। इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या आधुनिक मंचीय अभिव्यक्ति और पारंपरिक आस्था की सीमाएं तय होनी चाहिए?