Naresh Bhagoria
29 Jan 2026
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर गुरुवार, 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) उस समय नाराज़ हो गए, जब यह प्रस्ताव सामने आया कि अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल होने चाहिए।
CJI ने कहा कि ये कैसी बातें हो रही हैं? हम सब हॉस्टल में साथ रहे हैं, और आज तो इंटर-कास्ट शादियां भी हो रही हैं। हम जातिविहीन समाज की ओर जा रहे हैं या पीछे लौट रहे हैं?
CJI सूर्यकांत ने कहा कि 75 सालों में हमने वर्गहीन समाज बनाने की दिशा में जो हासिल किया है, क्या अब हम जातिविहीन समाज की तरफ बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं?
कोर्ट ने जाति के आधार पर अलग-अलग हॉस्टल बनाने के विचार को खतरनाक सामाजिक संकेत बताया।
सुनवाई के दौरान CJI ने कॉलेजों में होने वाली रैगिंग का जिक्र करते हुए कहा कि अक्सर उत्तर भारत, दक्षिण भारत और नॉर्थ-ईस्ट से आने वाले छात्रों के साथ संस्कृति और पहचान के आधार पर टिप्पणियां की जाती हैं, जो मानसिक उत्पीड़न का कारण बनती हैं।
याचिकाकर्ता के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि वह UGC नियमों की धारा 3(c) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसमें सिर्फ SC, ST और OBC वर्ग का उल्लेख है।
उन्होंने कहा कि भेदभाव की परिभाषा पहले से धारा 3(e) में मौजूद है। ऐसे में 3(c) की अलग से जरूरत नहीं। यह नियम समाज में विभाजन पैदा करता है।
वकील ने कहा कि भेदभाव केवल SC, ST और OBC तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जातियों और वर्गों के साथ भी होता है। उन्होंने धारा 3(c) पर स्टे लगाने की मांग की।
इस पर CJI ने कहा कि अदालत सिर्फ यह देख रही है कि नए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के अनुरूप हैं या नहीं।
CJI ने सवाल किया कि अगर कोई दक्षिण भारतीय छात्र उत्तर भारत के कॉलेज में या उत्तर भारत का छात्र दक्षिण के कॉलेज में पढ़ने जाए और उसके साथ भेदभाव हो, तो क्या धारा 3(e) में उसका समाधान है? वकील ने जवाब दिया कि हां और यही कारण है कि कुछ जातियों के लिए अलग धारा बनाने की जरूरत नहीं थी।
एक अन्य वकील ने कहा कि अगर सामान्य वर्ग का छात्र कॉलेज में आता है और सीनियर्स द्वारा उसकी रैगिंग होती है, तो इन नियमों में उसके लिए कोई सुरक्षा नहीं है।
इस पर CJI ने सवाल उठाया कि क्या UGC के नए नियमों में रैगिंग को शामिल किया गया है?
वकील ने जवाब दिया - नहीं।
कोर्ट ने कहा कि कॉलेजों में उत्पीड़न सिर्फ जाति के आधार पर नहीं, बल्कि सीनियर-जूनियर सिस्टम के कारण भी होता है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सवाल किया कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से मौजूद है, तो जाति आधारित भेदभाव को अलग से क्यों परिभाषित किया गया?
CJI ने कहा कि कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या नियमों को समावेशी और संतुलित भाषा में दोबारा लिखा जा सकता है, जिससे सभी के साथ न्याय हो।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है और कहा है कि पुराने नियम लागू रहेंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई तय की जाएगी।
13 जनवरी 2026 को UGC ने समता विनियम 2026 लागू किया था, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करना है। हालांकि, इस नियम को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।