Bilaspur:मुस्लिम कानून में Hiba पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला,सिर्फ रजिस्ट्री काफी नहीं, कब्जा देना भी जरूरी

प्रेम कुमार रायपुर/बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के Hiba (हिबा/उपहार) को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल उपहार विलेख का पंजीयन हो जाने से हिबा अपने आप वैध नहीं हो जाता। इसके लिए दानकर्ता की घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति और संपत्ति के कब्जे की वास्तविक सुपुर्दगी जरूरी है। कोर्ट ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए प्रथम अपील खारिज कर दी।
सिर्फ रजिस्ट्री से Hiba वैध नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में वैध हिबा के लिए तीन जरूरी शर्तें होती हैं। पहली, दानकर्ता द्वारा उपहार की स्पष्ट घोषणा, दूसरी, प्राप्तकर्ता द्वारा उसकी स्वीकृति और तीसरी, उपहार में दी गई संपत्ति का कब्जा प्राप्तकर्ता को सौंपना। केवल पंजीकृत दस्तावेज में कब्जा देने का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है।
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2019 में चार लोगों के नाम हुई थी संपत्ति
मामला रायपुर के खनिज नगर, पुरैना तेलीबांधा स्थित प्लॉट नंबर 46 से जुड़ा है। संपत्ति का क्षेत्रफल करीब 1500 वर्गफीट बताया गया है। प्रतिवादियों के अनुसार संपत्ति के मालिक ने 27 मार्च 2019 को चार लोगों के पक्ष में पंजीकृत उपहार विलेख किया था। इसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में भी उनके नाम दर्ज किए गए।
370 वर्गफीट हिस्से पर पहले से था कब्जा
वादी पक्ष का कहना था कि दिवंगत नौशाद अली ने संपत्ति खरीदने और निर्माण में राशि खर्च की थी। संपत्ति के एक हिस्से में करीब 370 वर्गफीट का मकान भी बना था, जिसमें उनकी पत्नी और बच्चे लंबे समय से रह रहे थे। उपहार विलेख के बाद उन्हें वहां से हटाने का प्रयास किया गया।
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कब्जा नहीं मिला तो अधूरा माना गया Hiba
अदालत ने पाया कि उपहार विलेख में कब्जा सौंपने का उल्लेख था, लेकिन वास्तविक स्थिति में वादी पक्ष करीब 370 वर्गफीट हिस्से पर लगातार काबिज था। प्रतिवादी यह साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं दे सके कि पूरी संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा उपहार प्राप्तकर्ताओं को सौंप दिया गया था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि मुस्लिम कानून के तहत हिबा की आवश्यक शर्तें पूरी तरह साबित नहीं हुईं।
चार लोगों को संयुक्त उपहार, हिस्सा भी स्पष्ट नहीं
हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि संपत्ति चार लोगों को संयुक्त रूप से दी गई थी, लेकिन उपहार विलेख में प्रत्येक व्यक्ति का अलग हिस्सा स्पष्ट नहीं किया गया था। संपत्ति का एक हिस्सा पहले से वादी पक्ष के कब्जे में था। अदालत ने मुस्लिम कानून में लागू ‘मुशा’ के सिद्धांत को भी मामले की परिस्थितियों में प्रासंगिक माना। हालांकि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मुशा के सिद्धांत को हर मामले में एक समान तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
जबरन नहीं हटाया जा सकता कब्जाधारी
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति पर लंबे समय से शांतिपूर्ण कब्जे में रह रहे व्यक्ति को केवल किसी विवादित दस्तावेज के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। यदि किसी पक्ष को संपत्ति पर बेहतर अधिकार का दावा है तो उसे कानून के तहत उचित राहत लेनी होगी। अदालत ने वादी पक्ष के लंबे समय से कब्जे को देखते हुए उनके कब्जे में हस्तक्षेप से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा को उचित माना।
निचली अदालत का फैसला बरकरार
हाई कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि 27 मार्च 2019 का पंजीकृत उपहार विलेख मुस्लिम कानून के तहत हिबा की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है। खास तौर पर पूरी संपत्ति के वास्तविक कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं हुई। खंडपीठ ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश के 24 नवंबर 2025 के फैसले और 27 नवंबर 2025 की डिक्री में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही प्रथम अपील खारिज कर दी गई।
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हाई कोर्ट का साफ संदेश
इस फैसले से स्पष्ट है कि मुस्लिम कानून के तहत Hiba में केवल कागजी प्रक्रिया या पंजीयन पर्याप्त नहीं है। घोषणा, स्वीकृति और वास्तविक कब्जे की सुपुर्दगी—तीनों महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय से शांतिपूर्ण कब्जे में रह रहे व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के बिना जबरन हटाया नहीं जा सकता।












