सिंगापुर। तेल की वैश्विक कीमतें इस समय लगातार दबाव में हैं। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड लगभग 65.82 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 61.80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह गिरावट पिछले सत्र की भारी बिकवाली के बाद आई है। दरअसल, बाजार में फिलहाल सबसे बड़ा कारण आपूर्ति अधिक होना और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमजोर मांग है। अमेरिका, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, उसकी आर्थिक स्थिति को लेकर निवेशकों में चिंता बनी हुई है। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में अमेरिकी उपभोक्ता कीमतों में सात महीने की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की है और बेरोजगारी भत्ते के नए आवेदन भी बढ़े हैं। यह संकेत है कि मुद्रास्फीति का संकट अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। इससे तेल की मांग पर दबाव पड़ रहा है, क्योंकि अगर महंगाई बढ़ी रहेगी और रोजगार की स्थिति कमजोर होगी, तो खपत भी घटेगी।
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हालांकि, माना जा रहा है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व अब ब्याज दरों में कटौती कर सकता है, ताकि आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सके। यदि ऐसा हुआ तो मांग बढ़ सकती है, लेकिन फिलहाल बाजार इस संभावना पर दांव लगाने से बच रहा है। एक ओर जहां यूक्रेन और मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में युद्ध और अस्थिरता जारी है, वहीं तेल की कीमतें उस हद तक सहारा नहीं ले पा रहीं। सामान्यत: भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में तेल के दाम ऊपर चढ़ते हैं, लेकिन इस बार स्थिति उलटी है। इसका कारण यह है कि मूलभूत आंकड़े आपूर्ति दबाव को प्रदर्शित कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2025 में तेल की आपूर्ति उम्मीद से कहीं तेजी से बढ़ेगी। इसका मुख्य कारण ओपेक प्लस देशों का उत्पादन बढ़ाना है।
ओपेक प्लस में शामिल सऊदी अरब और रूस जैसे देश अक्टूबर से उत्पादन कोटा बढ़ाने जा रहे हैं। खासकर सऊदी अरब ने यह रणनीति अपनाई है कि वह अधिक उत्पादन कर बाजार हिस्सेदारी को वापस हासिल कर सके। इसके अलावा, सऊदी अरब की सरकारी कंपनी अरामको ने अक्टूबर से चीन को 1.65 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल भेजने का फैसला किया है, जो सितंबर के मुकाबले काफी अधिक है। इससे साफ है कि एशियाई बाजारों में भी आपूर्ति और बढ़ने वाली है। दूसरी ओर, खुद ओपेक का मानना है कि 2025 और 2026 में वैश्विक मांग मजबूत बनी रहेगी और उसने अपने मांग अनुमान में कोई बदलाव नहीं किया है। यानी ओपेक को भरोसा है कि आर्थिक विकास जारी रहेगा और मांग बनी रहेगी।
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बाजार की वास्तविक स्थिति फिलहाल कमजोर खपत और भारी आपूर्ति की तरफ इशारा करती है। कच्चे तेल का बाजार इस समय अस्थिर है। एक ओर आपूर्ति का दबाव है, तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण कभी-कभार हल्की बढ़त देखने को मिल जाती है। लेकिन अब यह भी साफ है कि केवल तनाव और संघर्ष की खबरें कीमतों को लंबे समय तक थाम नहीं पा रही हैं। असली असर उत्पादन और खपत के आंकड़ों से तय होगा। यही कारण है कि हाल की गिरावट ने सप्ताह की शुरुआत में हुई हल्की बढ़त को पूरी तरह मिटा दिया है। कुल मिलाकर, वैश्विक तेल बाजार की दिशा अब उत्पादन में बढ़ोतरी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करती है।