2018 में मिल गया था ‘जहर’ का अलर्ट, 7 साल सोता रहा निगम! भागीरथपुरा कांड में आधा दर्जन अफसर जिम्मेदार

इंदौर। भागीरथपुरा के दूषित पानी कांड को लेकर हाई कोर्ट में पेश की गई जांच रिपोर्ट ने नगर निगम और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि जिस दूषित पानी ने दिसंबर 2025 में भागीरथपुरा के लोगों की जिंदगी को संकट में डाल दिया, उसके खतरे की जानकारी अधिकारियों को करीब सात साल पहले ही हो चुकी थी।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2018 में ही अपनी रिपोर्ट में चेताया था कि नालों और दूषित क्षेत्रों के आसपास लगे कई बोरिंग से खराब पानी निकल रहा है। इसके बावजूद नगर निगम स्तर पर पाइपलाइन बदलने और समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वर्षों तक लंबित रही पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया हादसे के बाद अचानक तेज हो गई। जिस काम को सात साल तक टाला जाता रहा, वह दूषित पानी की वजह से मौतों के बाद महज सात महीने में पूरा कर दिया गया।
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2018 की रिपोर्ट में ही लिखी थी खतरे की कहानी
जांच रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2018 में भागीरथपुरा समेत शहर के दूसरे इलाकों में पानी की गुणवत्ता को लेकर जांच की थी। इसमें नालों के आसपास स्थित बोरिंग के पानी में प्रदूषण की स्थिति सामने आई थी। रिपोर्ट के जरिए यह भी संकेत दिया गया था कि कई इलाकों में लोग ऐसे पानी का इस्तेमाल घरेलू कामों के साथ-साथ पीने के लिए भी कर रहे हैं। यानी जिम्मेदार विभागों के पास खतरे की जानकारी मौजूद थी। उन्हें यह भी पता था कि दूषित भूजल सीधे लोगों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। इसके बावजूद रिपोर्ट को उस गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसकी जरूरत थी। जांच रिपोर्ट अब यही सवाल खड़ा कर रही है कि अगर 2018 में ही समस्या सामने आ गई थी, तो उसके स्थायी समाधान के लिए तत्काल कदम क्यों नहीं उठाए गए?
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सात साल तक शिकायतें और फाइलों में अटका समाधान
भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या अचानक दिसंबर 2025 में पैदा नहीं हुई थी। जांच के दौरान सामने आया कि स्थानीय रहवासी सितंबर 2025 से ही पानी खराब आने की शिकायतें कर रहे थे। आयोग के सामने एक दर्जन से अधिक रहवासियों ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने जनप्रतिनिधियों तक अपनी समस्या पहुंचाई थी। लोगों का कहना था कि शिकायत सुनने के बाद उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलता रहा कि मामले को दिखवाया जाएगा। लेकिन जमीन पर समस्या बनी रही। इसके बाद दिसंबर के शुरुआती दिनों में क्षेत्र में लोगों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके बावजूद संबंधित विभागों की सक्रियता उस स्तर की नहीं रही, जैसी किसी संभावित स्वास्थ्य संकट की स्थिति में होनी चाहिए थी।
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28 दिसंबर को बढ़ा दबाव, तब हरकत में आया प्रशासन
28 दिसंबर को जब भागीरथपुरा में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की खबर सामने आई तो मामला गंभीर हो गया। इसके बाद कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई। मामला बढ़ने के साथ प्रशासन और नगर निगम के अधिकारी सक्रिय हुए। पानी की जांच, पाइपलाइन और सप्लाई व्यवस्था को लेकर कार्रवाई शुरू हुई। जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, यदि शिकायतों और पहले से मौजूद रिपोर्ट को समय रहते गंभीरता से लिया जाता तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।
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110 पन्नों की रिपोर्ट में अफसरों की भूमिका पर सवाल
हाई कोर्ट में पेश की गई 110 पेज की जांच रिपोर्ट में हादसे के लिए नगर निगम के करीब आधा दर्जन अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। जांच में यह माना गया कि संबंधित अधिकारियों के स्तर पर समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। रिपोर्ट के निष्कर्षों में यह संकेत दिया गया है कि यदि जिम्मेदार अधिकारी पहले ही चेतावनियों को गंभीरता से लेते और समस्या का स्थायी समाधान करते तो भागीरथपुरा जैसी स्थिति बनने से रोकी जा सकती थी। इस रिपोर्ट ने अब नगर निगम की निगरानी व्यवस्था, शिकायत निवारण प्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
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25 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बदलने का काम सालों अटका रहा
भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल की पाइपलाइन का नेटवर्क करीब 25 किलोमीटर लंबा बताया गया है। जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि पाइपलाइन बदलने के लिए शासन की दो बड़ी योजनाओं के तहत राशि उपलब्ध कराई गई थी। इसके बावजूद वर्षों तक पाइपलाइन बदलने का काम आगे नहीं बढ़ सका। अब यही पहलू पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। जब समस्या की जानकारी थी, योजनाओं में पैसा भी आया था और पाइपलाइन बदलने की जरूरत भी सामने थी, तो काम समय पर क्यों नहीं हुआ?
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मौतों के बाद वही काम सात महीने में पूरा
भागीरथपुरा कांड के बाद नगर निगम ने पाइपलाइन बदलने का काम तेजी से शुरू किया। जिस व्यवस्था में वर्षों तक निर्णय और कार्रवाई अटकी रही, उसी काम को हादसे के बाद करीब सात महीने में पूरा कर दिया गया। यह अंतर ही जांच रिपोर्ट के सबसे गंभीर सवालों में से एक है। यदि सात महीने में पाइपलाइन बदली जा सकती थी, तो फिर सात साल तक इंतजार क्यों किया गया?
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एक रिपोर्ट नजरअंदाज हुई, फिर सामने आया बड़ा संकट
भागीरथपुरा की घटना ने यह भी दिखाया कि किसी क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता से जुड़ी चेतावनी को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। 2018 की रिपोर्ट में खतरे की जानकारी सामने आने के बाद भी यदि लगातार निगरानी और सुधारात्मक कार्रवाई होती, तो संभव है कि वर्ष 2025 में हालात इतने गंभीर नहीं होते। अब हाई कोर्ट में पेश रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारी तय करने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 2018 की चेतावनी के बाद किन अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की, पाइपलाइन बदलने की योजनाओं में देरी क्यों हुई और सितंबर 2025 से मिल रही शिकायतों पर समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए।




















