भागीरथपुरा जल त्रासदी: एनजीटी में रिपोर्ट ने खोलीपोल ,भूमिगत पानी तक पहुंचा ई-कोलाई बैक्टीरिया

इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 लोगों की मौत के मामले में गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। स्वास्थ्य विभाग और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की संयुक्त समिति ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी रिपोर्ट में बताया है कि भागीरथपुरा के भूमिगत जल तक मलमूत्र में पाया जाने वाला खतरनाक ई-कोलाई (E. coli) बैक्टीरिया पहुंच चुका है। रिपोर्ट के सामने आने के बाद एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही तय किए बिना प्रकरण बंद नहीं किया जाएगा।
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नर्मदा के पानी में नहीं मिला ई-कोलाई
गुरुवार को एनजीटी में पेश रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ समिति ने घटना के करीब तीन महीने बाद विभिन्न स्रोतों से 43 पानी के नमूने एकत्र किए थे। इनमें 10 नमूने नर्मदा पाइपलाइन के थे। जांच में इन नमूनों में ई-कोलाई बैक्टीरिया नहीं मिला। यही नर्मदा का पानी भागीरथपुरा क्षेत्र में सप्लाई किया जाता है।
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कान्ह नदी और बोरवेल में मिला खतरनाक बैक्टीरिया
रिपोर्ट में बताया गया कि कान्ह नदी से लिए गए तीन नमूनों में ई-कोलाई बैक्टीरिया की भारी मात्रा मिली। इसके अलावा क्षेत्र के एक बोरवेल के पानी में भी बैक्टीरिया की खतरनाक मौजूदगी पाई गई। इससे यह संकेत मिला कि दूषित जल का असर अब भूमिगत जल स्रोतों तक पहुंच चुका है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
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एनजीटी ने मांगा तीन सप्ताह में जवाब
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने कहा कि इस मामले में जिम्मेदारी तय किए बिना इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट सभी संबंधित पक्षों को भेजते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
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हाईकोर्ट के आयोग की जांच भी जारी
सुनवाई में यह भी बताया गया कि भागीरथपुरा जल त्रासदी की जांच मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित न्यायिक आयोग भी कर रहा है। आयोग यह तय करेगा कि किन अधिकारियों और एजेंसियों की कथित लापरवाही के कारण दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंचा और इतनी बड़ी जनहानि हुई।
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आम लोगों के लिए क्यों चिंता की बात?
विशेषज्ञों का कहना है कि ई-कोलाई बैक्टीरिया सामान्यतः मानव और पशुओं के मल में पाया जाता है। इसका भूजल में पहुंचना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं सीवेज और पेयजल व्यवस्था या भूजल स्रोतों के बीच गंभीर प्रदूषण हुआ है। यदि समय रहते इसकी रोकथाम नहीं की गई, तो यह जलजनित बीमारियों का बड़ा कारण बन सकता है। इसलिए नागरिकों को भी बिना जांच के बोरवेल या संदिग्ध स्रोतों का पानी पीने से बचना चाहिए और जल गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की तुरंत सूचना प्रशासन को देनी चाहिए।












