इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी केस की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, फैसला सुरक्षित

इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई मौतों और लोगों के बीमार पड़ने के मामले में जांच आयोग की रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं होगी। रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग ने 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट तैयार कर हाई कोर्ट में पेश कर दी है। 25 अगस्त को हुई सुनवाई में रिपोर्ट को आम लोगों के सामने लाने की मांग उठी, लेकिन सरकार ने इसका विरोध किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने इस मांग पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
रिपोर्ट रजिस्ट्रार के पास रखी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एडवोकेट रितेश इनानी ने कोर्ट में दलील दी कि यह मामला सीधे तौर पर जनहित से जुड़ा है। बड़ी संख्या में लोग घटना से प्रभावित हुए हैं, इसलिए जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। सरकार ने इसके विपरीत रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर आपत्ति जताई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने तत्काल कोई आदेश नहीं दिया और रिपोर्ट रजिस्ट्रार के पास रखवा दी। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।
दूषित पानी की वजह और जिम्मेदारी तय करना था मकसद
भागीरथपुरा में दूषित पानी की आपूर्ति के बाद बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने और मौतों की घटनाओं के बाद हाई कोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था। आयोग को यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई थी कि पानी दूषित कैसे हुआ, इसके लिए कौन जिम्मेदार था और कितनी मौतों व बीमारियों का संबंध दूषित पानी से था। प्रभावित परिवारों को राहत और मुआवजे से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जानी थी।
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नगर निगम से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक के रिकॉर्ड जुटाए
जांच के दौरान आयोग ने इंदौर नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA), जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सहित संबंधित विभागों से रिकॉर्ड और दस्तावेज जुटाए। इसके अलावा प्रभावित लोगों और आम नागरिकों के लिखित बयान भी लिए गए। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया। जांच के दायरे में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल रहे। सरकार ने अब तक इन मौतों को आधिकारिक रूप से दूषित पानी से जोड़ते हुए मुआवजे की अंतिम राशि तय नहीं की है। हालांकि रेडक्रॉस की ओर से प्रभावित लोगों को इलाज के लिए दो लाख रुपए की सहायता दिए जाने की जानकारी है।
दो आईएएस अधिकारियों की भूमिका पर भी नजर
जांच रिपोर्ट को लेकर तत्कालीन निगमायुक्त और तत्कालीन अपर आयुक्त की भूमिका पर भी नजर बनी हुई है। इसके अलावा कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव, स्थानीय पार्षद कमल वाघेला और अन्य संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की गई है। रिपोर्ट में इनकी भूमिका को लेकर क्या निष्कर्ष निकाले गए हैं, इसकी जानकारी फिलहाल सार्वजनिक नहीं हुई है। अब सभी की नजर हाई कोर्ट के उस फैसले पर है, जिसमें रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने की मांग पर निर्णय होगा।
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