11 साल बाद फिर कटघरे में पुलिस, बदला सिर्फ किरदार?कस्टोडियल डेथ पर दो तस्वीरें, पुलिस पर वही सवाल

इंदौर पुलिस को 20 दिसंबर 2015 का वह मामला शायद फिर याद आने लगा है, जब एमआईजी थाने की हिरासत में एक युवक की मौत ने पूरे पुलिस सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। उस समय कार्रवाई सीधे थाना प्रभारी तक पहुंची थी, लेकिन अब 2026 में सामने आए भागीरथपुरा चौकी मौत मामले में कार्रवाई केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित दिखाई दे रही है। यही वजह है कि दोनों मामलों की तुलना तेज हो गई है। हाल ही में 20 अप्रैल 2026 को श्रीराम पुत्र रमेशचंद झा की मौत के मामले में पुलिस अधिकारियों ने चौकी प्रभारी संजय धुर्वे और सिपाही योगेंद्र कोरव को हटाकर विभागीय जांच शुरू कर दी। लेकिन शहर में सवाल उठ रहे हैं कि क्या केवल लाइन अटैच करना और विभागीय जांच शुरू करना ही पर्याप्त कार्रवाई है? आखिर इस मामले में “मानव वध” जैसी गंभीर धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं?
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11 साल पहले एमआईजी थाने में क्या हुआ था?
20 दिसंबर 2015 को एमआईजी थाना पुलिस ने पंकज वैष्णव को वाहन चोरी के शक में हिरासत में लिया था। कुछ घंटों बाद उसकी लाश लॉकअप में मिली। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया, लेकिन परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस की पिटाई से उसकी मौत हुई। मामला बढ़ने पर परिवार सीधे हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट के आदेश पर न्यायिक जांच हुई। जांच के बाद कोर्ट ने तत्कालीन थाना प्रभारी एम.ए. सैयद समेत अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 306 के तहत केस दर्ज करने के आदेश दिए थे। इतना ही नहीं, कोर्ट ने तत्कालीन टीआई को जमानत देने से इनकार करते हुए जेल भेज दिया था। बताया जाता है कि उन्हें करीब 83 दिन जेल में रहना पड़ा था।
अब क्यों बदल गए कानून के मायने?
अब 2026 के मामले में सवाल उठ रहे हैं कि जब पुराने मामले में सीधे थाना प्रभारी तक जिम्मेदारी तय की गई थी, तो इस बार वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं हो रही? आखिर क्यों मामला केवल चौकी प्रभारी और एक सिपाही तक सीमित दिखाई दे रहा है? चर्चा इस बात की भी है कि मौजूदा मामले में कुछ नेताओं द्वारा फरियादियों तक पहुंचकर “समझौते” की कोशिश की गई, जिससे पूरे प्रकरण ने नया मोड़ ले लिया। इसी वजह से पुलिस की कार्रवाई और जांच दोनों पर सवाल उठने लगे हैं।
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उस समय भी गुर्जर... इस बार भी गुर्जर
2015 के मामले में अधिवक्ता धर्मेंद्र गुर्जर ने पीड़ित परिवार की ओर से मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ी थी। पुलिस दबाव और राजनीतिक प्रभाव के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया था। उसी लड़ाई का परिणाम था कि तत्कालीन टीआई को जेल तक जाना पड़ा। लेकिन अब भागीरथपुरा चौकी मौत मामले में फिर एक “गुर्जर” चर्चा में है, हालांकि इस बार तस्वीर उलट दिखाई दे रही है। आरोप हैं कि टीआई सियाराम गुर्जर पीड़ित पक्ष तक एक मंडल अध्यक्ष के माध्यम से पहुंचकर पूरे मामले की दिशा बदलने की कोशिश में जुटे हैं। चर्चा यह भी है कि समझौते और दबाव की राजनीति के जरिए मामले को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
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दो मामलों की तुलना क्यों?
शहर में अब दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है। एक ओर धर्मेंद्र गुर्जर थे, जिन्होंने सिस्टम से लड़कर पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर अब आरोप लग रहे हैं कि सत्ता और प्रभाव का इस्तेमाल कर मामले को मोड़ने की कोशिश हो रही है। दोनों मामलों में “गुर्जर” नाम जरूर समान है, लेकिन दोनों की भूमिका और छवि में जमीन-आसमान का फर्क साफ दिखाई दे रहा है।












