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वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका ने वीजा प्रक्रिया में एक नया सख्त नियम लागू किया है। अब डायबिटीज, मोटापा, हृदय रोग, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे अप्रवासी नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश पाना और वीजा मिलना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग ने सभी अमेरिकी दूतावासों और कांसुलेट्स को निर्देश दिया है कि, ऐसे आवेदकों को ‘पब्लिक चार्ज’ यानी सरकारी संसाधनों पर बोझ बनने के आधार पर वीजा न दें।
‘पब्लिक चार्ज’ नीति के तहत वीजा अधिकारियों को यह तय करना होगा कि, आवेदक भविष्य में महंगी चिकित्सा देखभाल या सरकारी सहायता पर निर्भर तो नहीं होगा। नई गाइडलाइन में विशेष रूप से निम्न बातें शामिल हैं-
वीजा अधिकारी यह जांचेंगे कि, क्या आवेदक अपनी चिकित्सा आवश्यकताओं के खर्च को खुद उठा सकता है या भविष्य में सरकारी संसाधनों पर निर्भर होगा।
लीगल इमिग्रेशन नेटवर्क के वरिष्ठ वकील चार्ल्स व्हीलर ने इस नीति चिंताजनक बताया है। उन्होंने कहा कि, वीजा अधिकारी मेडिकल विशेषज्ञ नहीं हैं, फिर भी उन्हें गंभीर स्वास्थ्य आकलन का अधिकार दिया जा रहा है। यह पक्षपात या गलत फैसले का कारण बन सकता है।
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की इमिग्रेशन वकील सोफिया जेनोवेस ने कहा कि, पहली बार स्वास्थ्य इतिहास को इतनी व्यापकता से वीजा निर्णयों में शामिल किया जा रहा है। डायबिटीज या हार्ट प्रॉब्लम किसी को भी हो सकते हैं, लेकिन अब यह वीजा रिजेक्शन का कारण बन सकता है।
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बीमारी |
संभावित खतरा |
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हृदय रोग |
महंगा इलाज, अस्पताल में भर्ती, दवाइयां |
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डायबिटीज |
इंसुलिन, डायलिसिस, ऑर्गन फेल्यर |
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कैंसर |
कीमोथेरेपी, रेडिएशन, लाखों डॉलर खर्च |
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सांस की दिक्कत |
अस्थमा, ऑक्सीजन की जरूरत |
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न्यूरोलॉजिकल डिजीज |
पार्किंसन, अल्जाइमर, लंबी देखभाल |
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मानसिक स्वास्थ्य |
डिप्रेशन, सिज़ोफ्रेनिया, दवाइयां और थेरेपी |
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मोटापा |
अस्थमा, स्लीप एप्निया, हाई ब्लड प्रेशर |
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विकलांगता |
दूसरों पर आश्रित, नौकरी नहीं कर पाएंगे |
वीजा अधिकारी यह तय करेंगे कि, क्या इन बीमारियों के इलाज के लिए आवेदक के पास पर्याप्त निजी संसाधन हैं या वह ‘पब्लिक चार्ज’ बन सकता है। वीजा प्रक्रिया में पहले सिर्फ संक्रामक रोग (TB, HIV) चेक होते थे। लेकिन अब पुरानी बीमारियों का पूरा इतिहास मांगा जाएगा।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि नई नीति से-
वीजा और ग्रीन कार्ड अस्वीकृति:
भारत में लगभग 1 लाख लोग हर साल ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं का घट सकता है उपयोग:
लोग मेडिकेड या अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का उपयोग नहीं करेंगे, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
बच्चों और बुजुर्गों पर असर:
पूरे परिवार की स्वास्थ्य स्थिति को जांचा जाएगा।
अर्थव्यवस्था पर असर:
कुशल अप्रवासी श्रमिकों की संख्या घटेगी, खासकर IT और हेल्थकेयर सेक्टर में।
भारत को 'डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड' कहा जाता है।