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संक्षिप्त बीमारी के बाद वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का 90 साल की उम्र में निधन, साहित्य जगत में शोक

अपने समय के अप्रतिम कथाकार और यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन के निधन से हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हो गया। सच कहा जाए तो ज्ञानरंजन के निधन से देश में प्रगतिकामी चेतना का स्वर शांत हो गया है। उन्होंने अपने रचनाकर्म से साठोत्तरी पीढ़ी के साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई।
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संक्षिप्त बीमारी के बाद वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का 90 साल की उम्र में निधन, साहित्य जगत में शोक
ज्ञानरंजन, वरिष्ठ साहित्यकार

जबलपुर। वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का 90 वर्ष की आयु में बुधवार देर रात जबलपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। इन दिनों वह उम्र जनित बीमारियों से जूझ रहे थे। ज्ञानरंजन के पारिवारिक मित्र पंकज स्वामी ने बताया कि वह वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे और बुधवार सुबह तबियत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां रात लगभग साढ़े दस बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने बताया कि साहित्यकार के परिवार में पत्नी सुनयना, पुत्री वत्सला और पुत्र शांतनु हैं और दोनों बच्चे जबलपुर में ही रहते हैं। गुरुवार दोपहर गौरीघाट मुक्तिधाम में ज्ञानरंजन का अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया। उनका रचनाकर्म बेहद विविधतापूर्ण रहा है। वह बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्वों को अपने लेखन का विषय बनाते रहे हैं। उन्होंने बेहद सूक्ष्मता के सात मानव मन की जटिलताओं को जिस तरह समझने, उन्हें विश्लेषित करने का प्रयास किया है, वह उनके रचनाकर्म को विशिष्ट बनाता है।  

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में की पढ़ाई   

वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवम्बर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जि‍ले में हुआ था। उनका प्रारम्भिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में व्यतीत हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 2013 में जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि दी। ज्ञानरंजन जबलपुर विश्वविद्यालय से संबंद्ध जी. एस. कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर रहे और 34 वर्ष की सेवा के बाद 1996 में सेवानिवृत्त हुए। ज्ञानरंजन के अनेक कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए और अनूठी गद्य रचनाओं की उनकी एक किताब ‘कबाड़खाना’ बहुत लोकप्रिय हुई। उन्हें हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण सम्मान’, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’, मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के ‘शिखर सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ और ज्ञानपीठ के ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण से भी नवाजा गया है।  

हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हुआ

अपने समय के अप्रतिम कथाकार और यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन के निधन से हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हो गया। सच कहा जाए तो ज्ञानरंजन के निधन से देश में प्रगतिकामी चेतना का स्वर शांत हो गया है। उन्होंने अपने रचनाकर्म से साठोत्तरी पीढ़ी के साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका लेखन बहुत विविधतापूर्ण रहा है। वह कभी किसी खांचे में नहीं बंधे। उनकी रचनाओं की बात करें तो फेंस के इधर और उधर उनका चर्चित कहानी-संग्रह है। इस कहानी संग्रह में उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, मानसिक द्वंद्वों और सामाजिक यथार्थ को समझने का प्रयास किया और बेहद सधी हुई भाषा में प्रस्तुत किया है। उनके रचनाकर्म पर बात करते हुए उनके एक और कहानी संग्रह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता-एक कंठ विषपायी।  इस कहानी संग्रह में उन्होंने व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा, अकेलेपन और नैतिक संघर्ष का प्रभावी चित्रण किया है। 

चुपचाप साहित्य-साधना में लगे रहे

यह रचना पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती है। अपनी एक और रचना-अनुभव के घेरे-में उन्होंने आधुनिक जीवन की जटिलताओं और व्यक्ति–समाज के टकराव को जिस सूक्ष्मता के साथ उठाया है, वह चमत्कार पैदा करता है। ज्ञानरंजन की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता या ताकत उनकी संवेदनशील, वैचारिक और आत्ममंथनपूर्ण शैली रही है। वे बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों, नैतिक सवालों और सामाजिक दबावों से जूझने-टकराने में ज्यादा दिलचस्पी लेते रहे हैं। यही बात उनके रचनाकर्म को महत्वपूर्ण बनाती है। उनमें एक स्थिति को 50 तरह से देखने और अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य थी। वह अपनी सहज भाषा से पाठक के साथ सीधा संवाद कायम करते थे। एक लेखन के अलावा एक संपादक के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है। एक संपादक के रूप में उन्होंने नई कहानी आंदोलन को नई दिशा दी।  

नई कहानी को वैचारिक विमर्श में लाए

उन्होंने बेहद कम आर्थिक संसाधनों के बीच लंबे समय तक साहित्यिक पत्रिका पहल का संपादन किया। इस पत्रिका ने हिंदी साहित्य को नई वैचारिक दिशा देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। पहल केवल एक साहित्यिक पत्रिका नहीं रही, बल्कि इसके आगे बढ़ते हुए यह विचार, प्रतिरोध और रचनात्मक बहस का सबसे भरोसेमंद मंच बनी। पहल पत्रिका का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि इसने नई कहानी और उत्तर–नई कहानी आंदोलन को वैचारिक मजबूती दी। इसमें प्रकाशित कहानियों ने मध्यवर्गीय जीवन, सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक दबावों और व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा को गहराई से अभिव्यक्त किया। पत्रिका ने सतही मनोरंजन से हटकर गंभीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील साहित्य को प्राथमिकता दी। अपने इन अविश्मरणीय योगदानों और विपुल रचनाकर्म की वजह से ज्ञानरंजन भारतीय साहित्य में हमेशा याद किए जाएंगे। 

Aniruddh Singh
By Aniruddh Singh

अनिरुद्ध प्रताप सिंह। नवंबर 2024 से पीपुल्स समाचार में मुख्य उप संपादक के रूप में कार्यरत। दैनिक जाग...Read More

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