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सिंगापुर। एशियाई कारोबार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त देखने को मिली। इसका मुख्य कारण रहा ओपेक प्लस देशों का यह फैसला कि वे अक्टूबर से उत्पादन को पहले की तुलना में धीमी गति से बढ़ाएंगे। इस निर्णय ने बाजार में आपूर्ति तंग होने की उम्मीद पैदा की है। साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर जारी अनिश्चितता और अमेरिका की कमजोर मध्यस्थता ने भी कीमतों को सहारा दिया। ब्रेंट ऑयल नवंबर वायदा 0.6 प्रतिशत की बढ़त के साथ 65.90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) कच्चा तेल 0.6 प्रतिशत चढ़कर 61.83 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। यह सुधार पिछले हफ्ते की गिरावट के बाद आया है, जब वैश्विक मांग को लेकर चिंताओं ने बाज़ार को दबाव में ला दिया था।
ओपेक प्लस ने रविवार को हुई बैठक में अक्टूबर में उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया, लेकिन यह बढ़ोतरी पहले की तुलना में काफी कम है। अब केवल 1,37,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि होगी, जबकि पहले महीनों में यह बढ़ोतरी क्रमशः 5,55,000 और 4,11,000 बैरल प्रतिदिन तक की गई थी। इस साल की शुरुआत में सऊदी अरब ने गिरती कीमतों के बीच बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने के लिए उत्पादन बढ़ाया था। लेकिन अब समूह सतर्क है और उसे लगता है कि वैश्विक मांग कमजोर हो सकती है, खासकर तब जब अमेरिका की आर्थिक वृद्धि ठंडी पड़ रही है और चीन की खपत सुस्त बनी हुई है। ओेपेक प्लस को डर है कि उत्तरी गोलार्ध में आने वाली सर्दियों के मौसम में आपूर्ति अधिशेष यानी सप्लाई ग्लट की स्थिति बन सकती है।
अमेरिका में गर्मियों का यात्रा सीजन खत्म होने के बाद ईंधन की मांग घटने के संकेत मिलने लगे हैं। ऐसे हालात में उत्पादन ज़्यादा बढ़ाना कीमतों पर दबाव डाल सकता है, इसलिए उन्होंने संतुलित रास्ता अपनाने का फैसला किया है। पिछले हफ्ते ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों ही 3 से 4 प्रतिशत टूट गए थे। इन नुकसानों का बड़ा हिस्सा शुक्रवार को दर्ज हुआ, जब अमेरिका की रोजगार रिपोर्ट निराशाजनक रही। नॉन-फार्म पेरोल्स डेटा ने यह साफ कर दिया कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था लगातार धीमी पड़ रही है। एक ओर इसने अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बढ़ाई, जिससे डॉलर कमज़ोर हुआ, लेकिन दूसरी ओर ईंधन की मांग कम होने का डर भी गहराया है।
अमेरिका के तेल भंडार से जुड़े आंकड़े भी पिछले हफ्ते सामने आए, जिनमें अप्रत्याशित रूप से स्टॉक बढ़ा दिखा। इसका मतलब यह है कि स्थानीय स्तर पर ईंधन की खपत घट रही है, क्योंकि गर्मियों का यात्रा सीजन समाप्त हो चुका है। मांग में कमी की यह प्रवृत्ति वैश्विक बाजारों को असुरक्षित बना रही है। कुल मिलाकर, तेल की मौजूदा बढ़त ओपेक प्लस के सतर्क फैसले और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जुड़ी है। लेकिन यह बढ़त कितनी टिकाऊ रहेगी, यह मांग पर निर्भर करेगा। अगर अमेरिका और चीन में खपत सुस्त बनी रही और वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर होती रही, तो कीमतें दोबारा दबाव में आ सकती हैं। फिलहाल निवेशकों की नज़र आने वाले हफ्तों में मांग और उत्पादन के ताज़ा संकेतकों पर टिकी है।