Instagram पर बच्चों की अश्लील सामग्री का खेल? पेड विज्ञापनों से Telegram तक पहुंच रहे थे यूजर्स, NHRC ने Meta को भेजा नोटिस

इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े यौन शोषण की सामग्री यानी CSAM तक पहुंच बनाने वाले विज्ञापनों का मामला अब गंभीर होता जा रहा है। यह सिर्फ सोशल मीडिया पर कंटेंट की निगरानी में हुई गलती का मामला नहीं है, बल्कि इससे भारत में ऐसे अपराधों की रिपोर्टिंग और पुलिस कार्रवाई की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC ने इस मामले में Meta, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। आयोग ने सभी से दो हफ्ते के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम पर कुछ पेड विज्ञापन ऐसे शब्दों और सर्च के जरिए लोगों को Telegram चैनलों तक पहुंचा रहे थे, जहां बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक यौन सामग्री मौजूद थी।
NHRC ने Meta से पूछा- पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई?
NHRC ने Meta से इस मामले में सीधा सवाल किया है कि अगर कंपनी को कथित अपराध की जानकारी मिली थी, तो क्या इसकी सूचना पुलिस को दी गई? आयोग ने यह भी पूछा है कि अगर पुलिस को जानकारी नहीं दी गई, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान क्यों नहीं की गई। POCSO एक्ट की धारा 19 के तहत अगर किसी व्यक्ति या संस्था को बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की जानकारी या आशंका होती है, तो इसकी सूचना पुलिस या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को देना जरूरी है। आयोग का कहना है कि ऐसी स्थिति में सिर्फ कंपनी के अंदर शिकायत पर चर्चा करना या अपनी इंटरनल प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अपराध की जानकारी मिलने पर कानून के मुताबिक संबंधित एजेंसियों को सूचना देना जरूरी है।
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AI सिस्टम को लेकर भी उठे गंभीर सवाल
इस मामले में दूसरा बड़ा सवाल सोशल मीडिया कंपनियों के AI सिस्टम को लेकर है। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल यूजर्स की पोस्ट को होस्ट करने तक सीमित नहीं हैं। AI और दूसरे सिस्टम यूजर्स को कंटेंट दिखाने, पोस्ट की पहुंच बढ़ाने और ज्यादा लोगों तक सामग्री पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। NHRC ने इसी आधार पर सवाल उठाया है कि अगर कोई प्लेटफॉर्म AI की मदद से कंटेंट को चुनने, बढ़ाने या यूजर्स तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो क्या उसे सिर्फ ‘इंटरमीडियरी’ यानी बीच की कड़ी मानकर कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है? आयोग ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी की सीमा तय हो सकती है।
2025 में करीब 19 लाख रिपोर्ट
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बच्चों से जुड़े ऑनलाइन यौन अपराधों की रिपोर्ट बड़ी संख्या में सामने आ रही है, लेकिन पुलिस कार्रवाई तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या काफी कम है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में साइबरटिपलाइन के जरिए भारत से जुड़े करीब 19 लाख अलर्ट या रिपोर्ट मिलीं। साइबरटिपलाइन ऐसा सिस्टम है, जिसके जरिए टेक कंपनियों की ओर से बच्चों से जुड़े यौन शोषण की संदिग्ध सामग्री की जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाई जाती है। भारत से जुड़ी रिपोर्ट पहले संबंधित राष्ट्रीय एजेंसियों तक पहुंचती हैं और इसके बाद इन्हें राज्य और जिला स्तर की पुलिस एजेंसियों को भेजा जाता है। लेकिन बड़ी संख्या में रिपोर्ट मिलने के बावजूद FIR और आगे की कार्रवाई का आंकड़ा काफी कम दिखाई देता है। यही अंतर अब जांच और सिस्टम की क्षमता पर सवाल खड़े कर रहा है।
FIR दर्ज होने से पहले भी कई चुनौतियां
पुलिस के लिए ऐसे मामलों में FIR दर्ज करना और आरोपी तक पहुंचना आसान नहीं होता। जांच के दौरान पुलिस को अकाउंट की जानकारी, IP एड्रेस, ईमेल, मोबाइल नंबर, डिवाइस की जानकारी और डिजिटल सबूत जुटाने पड़ते हैं। इसके बाद इन सबूतों की फॉरेंसिक जांच की जाती है। एक बड़ी चुनौती बच्चे की उम्र साबित करना भी है। कई बार फोटो या वीडियो की क्वालिटी खराब होती है या उसमें ऐसी जानकारी नहीं होती जिससे यह स्पष्ट हो सके कि संबंधित व्यक्ति नाबालिग है। ऐसी स्थिति में जांच एजेंसियों के लिए कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।
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NCRB के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं
NCRB की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के खिलाफ IT एक्ट के तहत दर्ज 1,238 साइबर अपराध मामलों में से 1,099 मामले बच्चों से जुड़ी यौन सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित थे। इससे पता चलता है कि बच्चों से जुड़े साइबर अपराधों में यौन सामग्री से संबंधित मामले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। FIR के बाद भी जांच लंबी हो सकती है। पुलिस को प्लेटफॉर्म से यूजर की जानकारी लेनी पड़ती है। इसके बाद IP एड्रेस, डिवाइस और अन्य डिजिटल सबूतों के आधार पर आरोपी की पहचान करने की कोशिश होती है।
कोर्ट में डिजिटल सबूत सबसे अहम
ऐसे मामलों की सुनवाई POCSO एक्ट के तहत बनी विशेष अदालतों में होती है। लेकिन कोर्ट में आरोपी को दोषी साबित करने के लिए डिजिटल सबूत बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। बचाव पक्ष अक्सर यह सवाल उठा सकता है कि किसी अकाउंट, मोबाइल या SIM का इस्तेमाल वास्तव में आरोपी ने ही किया था या नहीं। इसके अलावा साइबर अपराध का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों में मौजूद सर्वर, एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म और अलग-अलग डिजिटल अकाउंट से जुड़ा हो सकता है। इससे जांच और मुश्किल हो जाती है।
UNICEF की रिपोर्ट ने भी खतरे की गंभीरता बताई
UNICEF की एक रिपोर्ट में भी बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। 21 देशों में 12 से 17 साल की उम्र के करीब 2.1 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों पर किए गए अध्ययन में बड़ी संख्या में बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना करने की बात सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, कई बच्चों को उनकी इच्छा के बिना यौन सामग्री दिखाई गई और कई बच्चों की निजी तस्वीरें बिना अनुमति शेयर की गईं। ज्यादातर घटनाएं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़ी बताई गईं, लेकिन बहुत कम मामले पुलिस या हेल्पलाइन तक पहुंच पाए।
अब जरूरत सिर्फ रिपोर्ट की नहीं, तेज कार्रवाई की
NHRC का यह नोटिस ऐसे समय आया है जब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। सिर्फ बड़ी संख्या में रिपोर्ट मिलना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि रिपोर्ट मिलने के बाद उनकी तेजी से जांच हो, बच्चों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और दोषियों तक कानून पहुंचे। AI, एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म और नए डिजिटल तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच पुलिस, सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।



















