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CG NEWS:40 साल बाद मिला इंसाफ: निजी जमीन पर सड़क बनाकर बैठी सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई 2 लाख की पेनल्टी

बिना अनुमति कब्जा, दशकों तक मुआवजा नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को फटकारते हुए कहा- पीड़ितों को और मुकदमेबाजी में क्यों उलझाया? निजी जमीन पर सड़क निर्माण और मुआवजा विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने भूमि मालिकों की संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा किया और लंबे समय तक उसका उपयोग करती रही, लेकिन उन्हें समय पर उचित मुआवजा
40 साल बाद मिला इंसाफ: निजी जमीन पर सड़क बनाकर बैठी सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई 2 लाख की पेनल्टी

RAIPUR/ BILASPUR NEWS। निजी भूमि पर बिना अनुमति सड़क निर्माण कर करीब चार दशक तक उचित मुआवजा नहीं देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने राज्य सरकार की अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए आठ सप्ताह के भीतर यह राशि प्रभावित भूमि मालिकों को देने का आदेश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि सरकार ने निजी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा किया और वर्षों तक उसका उपयोग करती रही, जबकि भूमि मालिक न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटते रहे।

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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

निजी जमीन पर सड़क निर्माण और मुआवजा विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने भूमि मालिकों की संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा किया और लंबे समय तक उसका उपयोग करती रही, लेकिन उन्हें समय पर उचित मुआवजा नहीं दिया गया।

1986 में बना दी गई थी सड़क

मामले की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई थी, जब लोक निर्माण विभाग (PWD) ने एक निजी भूमि पर सड़क का निर्माण कर दिया। आरोप है कि सड़क निर्माण से पहले न तो भूमि मालिकों की सहमति ली गई और न ही किसी प्रकार का मुआवजा दिया गया।

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सीमांकन में खुली बड़ी गड़बड़ी

बाद में सीमांकन प्रक्रिया के दौरान यह खुलासा हुआ कि सड़क सरकारी नहीं बल्कि निजी भूमि पर बनाई गई है। इसके बाद प्रभावित भूमि मालिकों ने वर्ष 2006 में अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की।

24 साल बाद शुरू हुआ अधिग्रहण

भूमि मालिकों द्वारा मुकदमा दायर किए जाने के बाद राज्य सरकार हरकत में आई और वर्ष 2010 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। यानी जिस जमीन पर 1986 में सड़क बनाई गई थी, उसके अधिग्रहण की कार्रवाई लगभग 24 साल बाद शुरू हुई।

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मुआवजे की राशि पर विवाद

जून 2011 में भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने अंतिम अवॉर्ड जारी करते हुए जमीन का मूल्य 4,308 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय किया। भूमि मालिकों ने इसे अपर्याप्त बताते हुए अदालत में चुनौती दी।

रेफरेंस कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा

मामला रेफरेंस कोर्ट पहुंचा, जहां मुआवजे की दर बढ़ाकर 5,380 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दी गई। इसके बाद मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचा, जहां रेफरेंस कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया।

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ब्याज देने का आदेश भी बरकरार

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को वर्ष 2006 से मुआवजे पर ब्याज देने का निर्देश दिया। अदालत ने पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद भुगतान होने तक 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की सरकार की दलील

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि निचली अदालतों के निष्कर्ष तथ्यात्मक और कानूनी रूप से पूरी तरह सही हैं।

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पीड़ितों को और परेशान करना चाहती है सरकार

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार की अपील से ऐसा प्रतीत होता है कि वह पहले से पीड़ित भूमि मालिकों को और अधिक मुकदमेबाजी में उलझाना चाहती है। अदालत ने इस रवैये को अनुचित बताया।

2 लाख का जुर्माना, 8 सप्ताह में भुगतान

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को पूरी तरह निराधार बताते हुए उस पर 2 लाख रुपये की लागत (कॉस्ट) लगाई। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि आठ सप्ताह के भीतर प्रभावित भूमि मालिकों को अदा की जाए।

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निजी संपत्ति अधिकारों पर बड़ा फैसला

कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को निजी संपत्ति के अधिकारों और समय पर उचित मुआवजा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय मान रहे हैं। यह फैसला भविष्य में सरकारी एजेंसियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी नागरिक की जमीन का उपयोग स्वीकार्य नहीं होगा।

PREM

मै प्रेम निर्मलकर मैने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से की, विगत 18 वर्षों से मुझे पत...Read More

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