स्मार्ट डिवाइस तैयार:नशे में होने पर वाहन स्टार्ट ही नहीं होगा
इंदौर। शराब या किसी अन्य नशीले पदार्थ के सेवन के बाद वाहन चलाना सड़क हादसों की बड़ी वजह बनता है। अक्सर हादसा होने के बाद पता चलता है कि चालक नशे में था। लेकिन अगर हादसे से पहले ही नशे में वाहन चलाने की कोशिश को रोक दिया जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। इसी सोच को तकनीक में बदलने का काम इंदौर के चार युवाओं ने किया है।
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शहर के युवाओं ने ऐसी स्मार्ट डिवाइस तैयार की है, जिसे वाहन में इंस्टॉल करने के बाद चालक के नशे में होने पर वाहन स्टार्ट ही नहीं होगा। डिवाइस का नाम ‘सेफइग्नाइट’ रखा गया है। इसका मूल सिद्धांत है—‘पहले टेस्ट, फिर स्टार्ट।’ यानी वाहन स्टार्ट करने से पहले चालक को एक छोटा सा टेस्ट देना होगा। टेस्ट के बाद सॉफ्टवेयर अनुमति देगा, तभी इंजन स्टार्ट होगा। टीम के मुताबिक डिवाइस को वाहन के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर से जोड़ा गया है और पिछले करीब आठ महीने से इसकी टेस्टिंग की जा रही है।
तीन साल पहले आया आइडिया, अब तैयार हुआ सिस्टम
इस तकनीक को तैयार करने के पीछे 25 वर्षीय ईशान गर्ग का आइडिया है। सीए की पढ़ाई कर रहे ईशान ने नशे में वाहन चलाने से होने वाले हादसों को देखकर सोचा कि ऐसी व्यवस्था क्यों न बनाई जाए, जिसमें नशे में व्यक्ति वाहन स्टार्ट ही न कर सके। इसी विचार के बाद उन्होंने अपने तीन दोस्तों उत्कर्ष सिंह, ऋतिक गर्ग और अनिकेत बुधवानी के साथ मिलकर वर्ष 2023 में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। लगातार तीन साल तक काम करने के बाद चारों ने ‘सेफइग्नाइट’ तैयार की। टीम ने इसका पेटेंट भी फाइल किया है। ईशान और उनकी टीम का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ तकनीक तैयार करना नहीं, बल्कि सड़क हादसों को रोकने के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाना है, जो हादसा होने के बाद कारण तलाशने के बजाय हादसे से पहले ही खतरे को रोक सके।
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दो-तीन सेकंड का टेस्ट, पास हुए तो ही स्टार्ट होगी गाड़ी
‘सेफइग्नाइट’ वाहन के इग्निशन सिस्टम से जुड़ी रहेगी। चालक को गाड़ी स्टार्ट करने से पहले महज दो से तीन सेकंड का टेस्ट देना होगा। टेस्ट के बाद सिस्टम यह तय करेगा कि वाहन स्टार्ट करने की अनुमति दी जाए या नहीं। यदि चालक टेस्ट में निर्धारित सीमा के भीतर पाया जाता है तो सॉफ्टवेयर ‘ओके’ सिग्नल देगा और वाहन स्टार्ट हो सकेगा। लेकिन यदि सिस्टम चालक को नशे में पाता है तो इग्निशन अपने आप लॉक हो जाएगा। इसके साथ अलार्म भी बजने लगेगा। यानी चालक चाहे कितनी भी कोशिश करे, सिस्टम की अनुमति के बिना वाहन स्टार्ट नहीं होगा।
डिवाइस से छेड़छाड़ रोकने पर भी फोकस
फाउंडर ईशान गर्ग के मुताबिक डिवाइस को इस तरह तैयार किया गया है कि उसके साथ छेड़छाड़ या सिस्टम को बायपास करना आसान न हो। वाहन में इंस्टॉल होने वाला हार्डवेयर और उसके साथ दिया जाने वाला सॉफ्टवेयर आपस में कनेक्टेड रहते हैं। इसका उद्देश्य यह है कि चालक टेस्ट से बचकर या सिस्टम के साथ छेड़छाड़ कर वाहन को स्टार्ट न कर सके। हालांकि किसी भी नई तकनीक की वास्तविक प्रभावशीलता, अलग-अलग वाहनों में इसकी संगतता और सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण होगी।
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हर 10 मिनट में चालक की फोटो, ताकि दूसरा व्यक्ति गाड़ी न चला सके
इस डिवाइस की एक और खास सुविधा चालक की पहचान से जुड़ी है। टीम के मुताबिक वाहन स्टार्ट होने के बाद डिवाइस हर 10 मिनट में चालक की फोटो लेकर सॉफ्टवेयर पर भेजती रहेगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिस व्यक्ति ने शुरुआत में टेस्ट दिया था, वही वाहन चला रहा है या नहीं। खासकर ट्रैवल कंपनियों, बस ऑपरेटरों और ट्रक मालिकों के लिए यह सुविधा उपयोगी हो सकती है, जहां एक वाहन को अलग-अलग चालक चला सकते हैं। यानी सिस्टम सिर्फ शुरुआत में नशे की जांच करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ड्राइविंग के दौरान चालक की पहचान पर भी नजर रखेगा।
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घर बैठे मालिक ले सकेगा चालक का टेस्ट
‘सेफइग्नाइट’ में ऑन-डिमांड टेस्ट का विकल्प भी दिया गया है। इसका मतलब है कि वाहन के मुख्य एक्सेस वाले व्यक्ति के पास दूर बैठकर चालक का टेस्ट लेने का विकल्प रहेगा। सॉफ्टवेयर के जरिए चालक को टेस्ट के लिए कॉल या रिक्वेस्ट भेजी जा सकेगी। चालक इसे स्वीकार करने के बाद उसी समय टेस्ट देगा। इससे वाहन मालिक या कंपनी संचालक जरूरत के अनुसार अपने ड्राइवर का टेस्ट ले सकेंगे। ट्रक, बस, कैब और ट्रैवल कंपनियों के लिए यह फीचर खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, क्योंकि मालिक या मैनेजर को हर वाहन के साथ मौके पर मौजूद रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
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आठ महीने से टेस्टिंग, भोपाल में भी दिए डेमो
डिवाइस तैयार होने के बाद करीब आठ महीने से इसकी टेस्टिंग की जा रही है। टीम ने भोपाल में कुछ ट्रैवल कंपनियों के साथ-साथ ट्रक और बस मालिकों को भी इसका डेमो दिया है। हाल ही में इंदौर पुलिस कमिश्नर के सामने भी ‘सेफइग्नाइट’ का डेमो किया गया। इसके बाद टीम का कहना है कि डिवाइस को लेकर लोगों और संस्थानों की रुचि बढ़ी है तथा मांग आना शुरू हो गई है। टीम अब इसे बड़े स्तर पर तैयार करने की दिशा में काम कर रही है।
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ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिए बन सकती है सुरक्षा की नई कड़ी
नशे में ड्राइविंग को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार वाहन मालिक को यह जानकारी नहीं होती कि चालक ने वाहन चलाने से पहले शराब या अन्य नशीले पदार्थ का सेवन किया है या नहीं। ऐसे में यदि यह तकनीक व्यावसायिक वाहनों में प्रभावी रूप से लागू होती है तो ट्रांसपोर्ट, बस और ट्रैवल कंपनियों के लिए यह एक अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था बन सकती है। वाहन रवाना होने से पहले चालक का टेस्ट और उसके बाद चालक की पहचान की निगरानी—दोनों व्यवस्थाएं एक ही सिस्टम में जोड़ने की कोशिश की गई है।
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‘हादसे के बाद पता लगाने से बेहतर, पहले ही रोकें’
ईशान गर्ग और उनकी टीम का कहना है कि इस तकनीक के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य सड़क सुरक्षा है। उनका मानना है कि हादसा होने के बाद यह पता लगाना कि चालक नशे में था, किसी परिवार को हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। इसलिए उनकी कोशिश ऐसी तकनीक विकसित करने की रही, जिसमें गाड़ी चलने से पहले ही यह तय हो जाए कि चालक वाहन चलाने की स्थिति में है या नहीं।












