Naresh Bhagoria
5 Feb 2026
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर मार्च महीने में सुनवाई करने की सहमति दी है, जिसमें चुनाव से पहले मुफ्त उपहार देने या बांटने वाली राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका में ऐसी पार्टियों का चुनाव चिन्ह जब्त करने या उनका पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की अपील की गई है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया कि इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को वर्ष 2022 में ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर राजनीतिक दल चुनाव के दौरान हर चीज का वादा करते हैं, जो एक तरह से भ्रष्ट आचरण है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह निश्चित रूप से एक गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दा है। उन्होंने याचिकाकर्ता से मार्च में इसे सूचीबद्ध कराने के लिए अदालत को याद दिलाने को कहा।
इससे पहले 25 जनवरी 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। उस समय पीठ ने कहा था कि कई बार मुफ्त उपहारों का बजट नियमित बजट से भी अधिक हो जाता है, जो गंभीर चिंता का विषय है और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर डालता है।
याचिका में कहा गया है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से अतार्किक मुफ्त उपहार देने का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है, जिससे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया बाधित होती है। याचिका में इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना के खिलाफ बताया गया है। साथ ही चुनाव आयोग से मांग की गई है कि वह चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 में संशोधन कर यह शर्त जोड़े कि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से मुफ्त उपहारों का वादा नहीं करेगा।