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शुक्र प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक विशेष व्रत है, जो तब रखा जाता है जब प्रदोष व्रत शुक्रवार के दिन पड़ता है। शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह से होने के कारण इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है।
सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक का समय प्रदोष काल कहलाता है। इसी समय भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस काल में की गई शिव पूजा विशेष फलदायी होती है।
शुक्र ग्रह को सुख, प्रेम, वैवाहिक जीवन, सौंदर्य, कला और भौतिक समृद्धि का कारक माना जाता है। जब प्रदोष व्रत शुक्रवार को पड़ता है, तो शिव कृपा के साथ-साथ शुक्र ग्रह की अनुकूलता भी प्राप्त होती है।
इस कारण यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए, विवाहित दंपतियों के लिए, प्रेम संबंधों में मधुरता चाहने वालों के लिए, आर्थिक स्थिरता और समृद्धि की कामना करने वालों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
प्रदोष व्रत की पूजा केवल सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में ही करनी चाहिए। इस समय के बाहर की गई पूजा से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
शास्त्रों के अनुसार शिव पूजा में तुलसी वर्जित मानी गई है। शुक्र प्रदोष व्रत पर भूलकर भी शिवलिंग पर तुलसी पत्र न चढ़ाएं।
इस दिन मांसाहार, शराब, लहसुन-प्याज और तामसिक भोजन का सेवन पूरी तरह वर्जित है। इससे पूजा और व्रत निष्फल माने जाते हैं।
झूठ बोलना, क्रोध करना, विवाद करना और अपशब्द बोलना इस व्रत पर अशुभ माना जाता है। इससे शुक्र और शिव दोनों की कृपा बाधित होती है।
शास्त्रों के अनुसार व्रत के दिन बाल, दाढ़ी या नाखून काटने से व्रत की पवित्रता भंग होती है, इसलिए इससे बचना चाहिए।
मान्यता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया शुक्र प्रदोष व्रत जीवन में सुख-शांति, वैवाहिक सौभाग्य, प्रेम-संतुलन, आर्थिक समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करता है। यह व्रत शिव भक्ति और ग्रह शांति का अद्भुत संगम माना जाता है।