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पल्लवी वाघेला, भोपाल। राजधानी भोपाल में एक दंपति ने तलाक लिया और 12 साल के बेटे को बोर्डिंग में छोड़ दिया। दोनों ने दो साल के अंदर दूसरी शादी भी कर ली, लेकिन 14 साल का हो चुका बेटा पूरी तरह अकेला हो गया। छुट्टियों में भी वह अकेला हॉस्टल में रहता था। धीरे-धीरे वह एग्रेसिव होने लगा और एक दिन स्कूल में एक बच्चे को उसने पीट दिया। बच्चे के दादा ने भोपाल कोर्ट में आवेदन दिया है कि बच्चे की जिम्मेदारी मां या पिता संभाले। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में जनवरी 2025 से सितंबर तक ऐसे 1949 मामले आए, इसमें से 282का समाधान कर दिया गया ।
काउंसलर्स के मुताबिक कोर्ट के लिए बच्चों का हित प्राथमिकता है। ऐसे मामलों में माता-पिता को समझाते हैं कि बच्चों की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते । कई मामलों में भरण-पोषण के आदेश दिए हैं तो वहीं कई मामलो में अभिभावकों से कहा गया है कि वह समय निश्चित कर बारी-बारी से बच्चे को अपने साथ रखें ।
एक केस में तलाक के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। मां ने भी दो साल बाद शादी कर ली। बच्चा अपनी मां को सौंप दिया। अब डेढ़ साल बाद ग्वालियर में रह रही नानी ने कोर्ट में आवेदन देकर कहा है कि नौ साल के बच्चे को संभालना उनके बस में नहीं है। बच्चे की मां का कहना है कि उस पर दूसरे पति के बच्चों की जिम्मेदारी है और वहां वह अपने बच्चे को नहीं ले जा सकती। बच्चे के पिता ने भी इनकार कर दिया है।
इंदौर के कपल में इसी बात को लेकर केस लंबा चल रहा है कि बेटी की कस्टडी कोई लेना नहीं चाहता। मां का तर्क है कि बेटी के साथ उन्हें दूसरी शादी में दिक्कत होगी। वहीं, पिता का कहना है कि उनका नया परिवार भी बेटी को अपनाने तैयार नहीं है और उन्हें आर्थिक परेशानी भी है, इसलिए जो एलुमनी मिल रही है उसके साथ बच्ची को उसकी मां ही संभाले।
काउंसलर दिव्या दुबे मिश्रा कहती हैं कि पैरेंट्स के बीच होने वाले झगड़ों का सीधा असर बच्चों के व्यवहार पर पड़ता है। विदेशों में सामाजिक ढांचा ऐसा है कि धीरे-धीरे बच्चे इसे स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन भारत में ये माहौल नहीं है। जब दूसरे बच्चों को माता-पिता के साथ खुश देखते हैं तो ये बच्चे एग्रेसिव हो जाते हैं। वे बैचेन व खुद को अनसेफ फील करते हैं। यहां तक कि बच्चों के दिमाग में सुसाइड और क्रिमिनल एक्टिविटी के विचार तक आ सकते हैं।