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PU Special :Gen-Z के बोलने का तरीका बदल रहा, मालवी-बुंदेली-निमाड़ी समझते हैं; लेकिन बोलने में कंफर्टेबल नहीं

दादा-दादी मालवी में पूछते हैं- 'कुठे जावो?' और जवाब आता है- 'कॉलेज जा रहा हूं।' घर में स्थानीय बोली आज भी मौजूद है, लेकिन नई पीढ़ी के जवाबों में हिंदी, अंग्रेजी और हिंग्लिश का दखल बढ़ गया है।
Gen-Z के बोलने का तरीका बदल रहा, मालवी-बुंदेली-निमाड़ी समझते हैं; लेकिन बोलने में कंफर्टेबल नहीं
Gen-Z के बोलने का तरीका बदल रहा

प्रभा उपाध्याय, इंदौर। गांव से शहर तक पहुंची Gen-Z के साथ सिर्फ रहन-सहन और पहनावा नहीं बदला, बातचीत की भाषा भी बदल रही है। मालवा में मालवी, बुंदेलखंड में बुंदेली और निमाड़ में निमाड़ी अब भी घर-आंगन में सुनाई देती हैं, लेकिन युवा इन्हें समझने के बावजूद बोलने में सहज नहीं हैं। इंदौर, उज्जैन और भोपाल जैसे शहरों में हिंदी, अंग्रेजी और हिंग्लिश का असर बातचीत में तेजी से बढ़ रहा है।

कहां कौन सी भाषा बोली जाती है

बुंदेली : सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह, पन्ना, दतिया क्षेत्र। मालवी : उज्जैन, इंदौर, देवास, रतलाम, मंदसौर। निमाड़ी : खरगोन, खंडवा, बड़वानी। बघेली : रीवा, सतना, सीधी, शहडोल। गोंडी : मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, छिंदवाड़ा – आदिवासी क्षेत्र। भिलाली, भीली, कंजारभाटी : झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी।

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इंदौर, उज्जैन और भोपाल में हिंग्लिश का असर

इंदौर, उज्जैन और भोपाल जैसे शहरों में स्कूल-कॉलेज की बातचीत हिंदी और अंग्रेजी के बीच सिमटती जा रही है। घर में माता-पिता या दादा-दादी मालवी और बुंदेली बोलते हैं, लेकिन बच्चे जवाब हिंदी या हिंग्लिश में देते हैं। बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में भी बुजुर्गों की सहज भाषा बुंदेली है, वहां भी युवाओं में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ा है। गांव से शहर तक पहुंची Gen-Z के साथ बातचीत की भाषा में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।

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स्कूलों में स्थानीय भाषा का विषय नहीं

जानकारों के मुताबिक, बेहतर शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे जिला और तहसील स्तर के निजी स्कूलों में पहुंच रहे हैं। यहां पढ़ाई हिंदी या अंग्रेजी माध्यम से होती है, जबकि स्थानीय बोलियों को न विषय के रूप में जगह मिलती है, न बोलचाल में प्रोत्साहन। विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों में स्थानीय बोली से जुड़ी गतिविधियां और पाठ्यक्रम में स्थान देने से नई पीढ़ी अपनी भाषाई विरासत से जुड़ी रह सकती है। इससे स्थानीय भाषा को समझने के साथ उसे बोलने में भी युवाओं की सहजता बढ़ सकती है।

स्थानीय भाषा को लेकर क्या कहते हैं परिजन? 

रामेश्वर पटेल, खुरई, सागर ने कहा कि तहसील स्तर पर ही काफी अंग्रेजी और हिन्दी स्कूल हो गए हैं, जहां पढ़ाई तो अच्छी है लेकिन स्थानीय भाषा को लेकर कोई प्रेरित नहीं करता। यही कारण है कि नई जेनरेशन स्थानीय भाषा से दूर हो रही है। उन्होंने कहा कि उनका बेटा अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पढ़ने जाता है। परिवार के सभी लोग बुंदेली भाषा बोलते हैं, लेकिन बेटा हिन्दी और अंग्रेजी में ही बात करता है।

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युवाओं की बातचीत में हिंदी-अंग्रेजी का बढ़ा दखल

राकेश पाटीदार, धार ने बताया कि उनके परिवार में आज भी सभी मालवी में बात करते हैं। लेकिन बच्चे शहर में पढ़ने गए तो उनकी बातचीत हिंदी और अंग्रेजी में ज्यादा होने लगी। मालवी में कुछ कहने पर वे समझ तो लेते हैं, लेकिन खुद मालवी में जवाब नहीं दे पाते। आर्दश सिंह, धार ने कहा कि वे मालवी समझ लेते हैं लेकिन बोलना नहीं आता। स्कूल में अंग्रेजी और सामान्य हिन्दी ही बोलने में आती है। उनके दोस्त भी हिन्दी और सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं। दादा और पापा मालवी में बात करते हैं लेकिन वे इसमें कंफर्टेबल नहीं हैं।

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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