गैस लाइन ब्लास्ट केस में एसडीएम के शपथपत्र पर हाईकोर्ट सख्त,झूठे दावों पर मांगा जवाब

इंदौर। विजयनगर क्षेत्र के वार्ड-31 में गैस लाइन के ऊपर बोरिंग के दौरान हुए विस्फोट मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने इंदौर के एसडीएम घनश्याम धनगर द्वारा दायर शपथपत्र में किए गए दावों पर सवाल उठाते हुए शासकीय पक्ष से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि शपथपत्र में इलाज का पूरा खर्च चुकाने और पीड़ितों को राहत देने का दावा किया गया, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग है।
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मामले में अधिवक्ता रितेश इनानी ने जनहित याचिका दायर कर हादसे में घायल सभी लोगों का नि:शुल्क उपचार कराने की मांग की थी। इस हादसे में गंभीर रूप से झुलसी झिनी झाला का उपचार अहमदाबाद के जायडस अस्पताल में चल रहा है, जहां इलाज का खर्च 15 लाख रुपये से अधिक हो चुका है।
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एसडीएम द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र के बिंदु-4 में कहा गया है कि हाईकोर्ट के निर्देशानुसार झिनी झाला के इलाज की पूरी व्यवस्था कर दी गई है और अस्पताल का पूरा भुगतान भी कर दिया गया है। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि मरीज या उसके परिजनों द्वारा किए गए खर्च का सत्यापन कर राशि लौटा दी गई है तथा यदि कोई भुगतान शेष होगा तो दस्तावेज प्रस्तुत करने पर उसका भी भुगतान कर दिया जाएगा।
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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी शामिल थे, ने इन दावों पर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि शपथपत्र में कही गई बातों और याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत तथ्यों में अंतर है। इस पर शासकीय अधिवक्ता से जवाब मांगा गया, लेकिन सुनवाई के दौरान स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को तय करते हुए विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, अदालत ने एसडीएम घनश्याम धनगर को भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं।
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सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि अन्य घायल अब भी अस्पताल में ड्रेसिंग और उपचार के लिए अपनी जेब से खर्च कर रहे हैं। उन्हें न तो उपचार की राशि वापस मिली है और न ही मुआवजा उपलब्ध कराया गया है। इस पर भी अदालत ने प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
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उधर, इस मामले में वार्ड-31 के भाजपा पार्षद बालमुकुंद सोनी की भूमिका भी चर्चा में रही। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद उनके खिलाफ भी प्रकरण दर्ज किया गया था। नगर निगम की जांच रिपोर्ट में पार्षद को जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि, अदालत में पार्षद की ओर से नगर निगम के इंजीनियरों और अधिकारियों को घटना के लिए जिम्मेदार बताया गया। इस पर हाईकोर्ट ने उनसे भी जवाब मांगा है। उनके अधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई तक का समय दिया।












