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इंडियंस के मुकाबले अमेरिकन इतने कॉन्फिडेंट होकर क्यों बोलते हैं? भारतीय महिला ने बताया बड़ा फर्क  

अमेरिकन्स मीटिंग में बिना पूरा जवाब जाने भी इतनी आसानी से अपनी बात कैसे रख देते हैं? अमेरिका में काम कर रही भारतीय महिला ने अपनी कहानी शेयर कर बताया कि भारतीयों और अमेरिकन्स के बोलने के तरीके में क्या बड़ा फर्क है और आत्मविश्वास को लेकर उनकी सोच कैसे बदल गई।
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इंडियंस के मुकाबले अमेरिकन इतने कॉन्फिडेंट होकर क्यों बोलते हैं? भारतीय महिला ने बताया बड़ा फर्क  

ऑफिस मीटिंग में अपनी बात रखने से पहले क्या आप भी कई बार सोचते हैं कि पहले जवाब पूरी तरह सही होना चाहिए, तभी बोलना चाहिए? अगर हां, तो अमेरिका में काम कर रहीं भारतीय प्रोफेशनल हरिणी का अनुभव आपके लिए दिलचस्प हो सकता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका जाने के बाद उनके लिए कॉन्फिडेंस का मतलब ही बदल गया। हरिणी ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि मीटिंग में उनके अमेरिकी सहकर्मी अक्सर किसी मुद्दे पर पूरी जानकारी या परफेक्ट जवाब का इंतजार नहीं करते थे। मन में कोई विचार आया तो वे उसे चर्चा में रख देते थे। इसके उलट, हरिणी तब तक अपनी बात रखने से बचती थीं, जब तक उन्हें अपने जवाब पर पूरा भरोसा न हो जाए।

अमेरिकी सहकर्मियों को देखकर लगा कि वे ज्यादा जानते हैं

हरिणी ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में अपने वर्कप्लेस का अनुभव बताया। उनके मुताबिक, जिस ऑफिस में वह काम करती थीं, वहां वह अकेली भारतीय थीं। शुरुआत में उन्हें लगता था कि उनके अमेरिकी सहकर्मी शायद उनसे ज्यादा जानते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि वे मीटिंग में काफी आसानी से अपनी राय रखते थे और सवालों पर खुलकर चर्चा करते थे। लेकिन कुछ समय ऑफिस में काम करने के बाद हरिणी को महसूस हुआ कि अंतर हमेशा जानकारी का नहीं था। असली फर्क यह था कि दोनों जगहों के लोग अपनी बात रखने को लेकर कितना सहज महसूस करते हैं।

'पहले पूरा जवाब पता होना चाहिए'

हरिणी के मुताबिक, उनकी आदत थी कि किसी मुद्दे पर तब तक न बोलें, जब तक उन्हें अपनी बात पर पूरा भरोसा न हो। उन्हें लगता था कि पहले सवाल को अच्छी तरह समझना और उसका सही जवाब तैयार करना जरूरी है। वहीं, उनके अमेरिकी सहकर्मी किसी विचार को अंतिम रूप देने से पहले ही चर्चा में रख देते थे। अगर उन्हें किसी मुद्दे पर कोई संभावना या राय नजर आती, तो वे उसे सामने रखकर दूसरों के साथ बातचीत करते थे। हरिणी को बाद में एहसास हुआ कि उनकी पुरानी आदत के कारण कई बार वह मीटिंग में बोलने का मौका गंवा देती थीं। हो सकता था कि जिस विचार को वह मन में लेकर बैठी हैं, वही बात कोई दूसरा व्यक्ति चर्चा के दौरान पहले ही कह दे।

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भारत में सीखी आदत बनी अमेरिका में चुनौती

हरिणी ने अपने अनुभव को भारत में पढ़ाई के दौरान बनी आदत से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के दौरान सही जवाब देने पर काफी जोर रहता था। बचपन से ही यह सोच बन जाती है कि बोलने से पहले अच्छी तरह सोचो और तभी जवाब दो, जब तुम्हें पूरा यकीन हो। स्कूल या परीक्षा में यह तरीका काफी उपयोगी है, क्योंकि वहां सही उत्तर का महत्व सबसे ज्यादा होता है। लेकिन ऑफिस मीटिंग में बातचीत का मकसद हमेशा सही जवाब देना नहीं होता। वहां किसी विचार पर चर्चा करना, सवाल उठाना और दूसरे लोगों के नजरिए को समझना भी उतना ही जरूरी होता है।

मीटिंग में परफेक्ट होने का इंतजार न करें

हरिणी के मुताबिक, वर्कप्लेस में किसी विचार को सामने रखने के लिए उसका 100 प्रतिशत तैयार होना जरूरी नहीं है। बातचीत के दौरान दूसरे लोग उस विचार में कुछ जोड़ सकते हैं, सवाल उठा सकते हैं या उसे बेहतर बना सकते हैं। अगर कोई कर्मचारी सिर्फ इस डर से चुप रहता है कि उसकी बात पूरी तरह सही नहीं है, तो वह चर्चा में योगदान देने का मौका खो सकता है। यही वह अंतर है जिसे हरिणी ने अमेरिका में काम करने के दौरान महसूस किया। उनके मुताबिक, अपनी बात रखने के लिए हर सवाल का जवाब पहले से पता होना जरूरी नहीं है।

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आत्मविश्वास जन्मजात नहीं, इसे सीखा जा सकता है

हरिणी ने बताया कि पहले उन्हें लगता था कि आत्मविश्वास किसी व्यक्ति के अंदर जन्म से होता है। यानी कोई स्वभाव से कॉन्फिडेंट है तो वह आसानी से लोगों के सामने बोल पाएगा और जो शर्मीला है, उसके लिए यह मुश्किल रहेगा। लेकिन अमेरिका में काम करने के अनुभव ने उनकी यह सोच बदल दी। अब उनका मानना है कि कॉन्फिडेंस एक ऐसी स्किल है, जिसे अभ्यास के जरिए विकसित किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि बिना जानकारी के किसी भी बात को सही बताने का आत्मविश्वास दिखाया जाए। बल्कि अगर किसी विषय पर आपके पास कोई विचार या राय है, तो उसे सामने रखने से डरना नहीं चाहिए। बातचीत के दौरान अपनी बात को बेहतर बनाया जा सकता है।

कम्युनिकेशन एक्सपर्ट भी तैयारी की देते हैं सलाह

स्टैनफोर्ड के कम्युनिकेशन एक्सपर्ट मैट अब्राहम्स भी मीटिंग में प्रभावी तरीके से बोलने के लिए तैयारी और अभ्यास को अहम मानते हैं। उनके मुताबिक, मीटिंग की शुरुआत किसी सवाल या चर्चा के साथ करने से लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है। नियमित अभ्यास से न सिर्फ बोलने का तरीका बेहतर होता है, बल्कि लोगों के सामने अपनी बात रखने का आत्मविश्वास भी बढ़ता है। हरिणी का अनुभव इसी बात की ओर इशारा करता है कि कॉन्फिडेंस का मतलब हर बात का जवाब जानना नहीं है। अपनी बात को सही समय पर सामने रखने की हिम्मत भी आत्मविश्वास का हिस्सा है। ऑफिस हो या रोजमर्रा की जिंदगी, कई बार परफेक्ट जवाब का इंतजार करने के बजाय बातचीत में शामिल होना ज्यादा जरूरी होता है।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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