PM मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ कहा तो बन गई ‘पार्टी’! एक दिन में 50 हजार फॉलोअर्स, आखिर कौन है इसके पीछे?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक नया कैंपेन चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया पर ‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ नाम से एक अकाउंट सामने आया है। इसे लेकर सोशल मीडिया यूजर्स के बीच तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है, जब प्रधानमंत्री मोदी के 15 अगस्त के भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर विपक्ष की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर इस नाम से अकाउंट का सामने आना राजनीतिक बहस को डिजिटल प्लेटफॉर्म तक ले गया है।
X पर सामने आया नया अकाउंट
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर @DNJP_India नाम से एक अकाउंट सामने आया है। यह अकाउंट कई चर्चित नेताओं और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को फॉलो कर रहा है। अकाउंट की फॉलोइंग लिस्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के अलावा यूट्यूबर ध्रुव राठी, कॉमेडियन कुणाल कामरा और अभिनेता प्रकाश राज जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि, केवल किसी अकाउंट का किसी व्यक्ति को फॉलो करना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वे लोग इस कैंपेन से जुड़े हुए हैं। अकाउंट के पीछे कौन लोग हैं और इसका संचालन किसके द्वारा किया जा रहा है, यह अलग सवाल है।
एक दिन में मिले हजारों फॉलोअर्स
‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ के नाम से अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पेज बनाए गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लॉन्च होने के कुछ ही समय में इस कैंपेन को बड़ी संख्या में लोग फॉलो करने लगे। बताया गया है कि अकाउंट को लॉन्च होने के पहले ही दिन 50 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स मिल गए थे। इसके बाद इंस्टाग्राम पर भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी और पेज के फॉलोअर्स की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा पहुंच गई। तेजी से बढ़ती यह संख्या दिखाती है कि राजनीतिक मुद्दों से जुड़े सोशल मीडिया कैंपेन अब कुछ ही घंटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं।
क्या है इस नए कैंपेन का स्लोगन?
‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ नाम से सामने आए कैंपेन का स्लोगन बताया जा रहा है- ‘सोचो, रिसर्च करो, विरोध करो।’ यह स्लोगन सोशल मीडिया पर कैंपेन की पहचान के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके जरिए समर्थक विचार करने, जानकारी जुटाने और असहमति दर्ज कराने की बात पर जोर देते नजर आ रहे हैं। हालांकि, इस अकाउंट को किसी आधिकारिक राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त है या नहीं, इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं है। इसलिए इसे फिलहाल सोशल मीडिया कैंपेन या डिजिटल पहल के तौर पर ही देखा जा रहा है।
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15 अगस्त के भाषण के बाद शुरू हुआ कैंपेन
यह पूरा मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद चर्चा में आया। 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सलियों’ के खतरे का जिक्र किया था। प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों पर निशाना साधा था, जिनकी सोच को उन्होंने नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित बताया। उन्होंने कहा था कि हथियारों वाले नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद कुछ लोग देश में अशांति फैलाने की कोशिश कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के बयान में किसी खास राजनीतिक दल या संगठन का नाम नहीं लिया गया था। इसके बावजूद उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
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विपक्ष ने किया पलटवार
पीएम मोदी के बयान के बाद विपक्षी नेताओं ने सरकार पर निशाना साधा। कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक विरोधियों से जोड़कर देखा। इसके बाद सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर अलग-अलग तरह के अभियान चलने लगे।
सोशल मीडिया बना राजनीतिक बहस का नया मैदान
‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ नाम का अकाउंट इसी राजनीतिक बहस के बीच सामने आया है। सोशल मीडिया पर ऐसे नाम और कैंपेन अब राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कई बार किसी राजनीतिक बयान के जवाब में यूजर्स नए नाम, हैशटैग या सोशल मीडिया पेज बनाकर अपनी राय रखते हैं। इससे किसी मुद्दे को तेजी से वायरल होने में मदद मिलती है। इस मामले में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री के बयान पर राजनीतिक बहस जारी है, वहीं दूसरी ओर उसी शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर नया डिजिटल कैंपेन खड़ा हो गया है।
कौन चला रहा है अकाउंट?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ अकाउंट के पीछे कौन है? फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि अकाउंट को कौन संचालित कर रहा है। जिन नेताओं और चर्चित लोगों को अकाउंट फॉलो कर रहा है, उनकी मौजूदगी को भी इस कैंपेन से सीधे जोड़ना सही नहीं होगा।
इसलिए अकाउंट की पहचान, संचालन और उद्देश्य को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जानकारी या पुष्टि का इंतजार करना जरूरी है।











