Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

लाल चींटी की चटनी खाई है आपने? चींटियों से बनती है ये अनोखी चटनी, स्वाद के साथ जुड़ी है आदिवासी परंपरा

पेड़ों पर मिलने वाली लाल चींटियों और उनके अंडों से तैयार होने वाली यह पारंपरिक चटनी आदिवासी इलाकों के खास खानपान का हिस्सा है। तीखे स्वाद वाली इस चटनी को पारंपरिक तरीके से सिलबट्टे पर पीसा जाता है। इसे लेकर स्थानीय स्तर पर कई स्वास्थ्य संबंधी मान्यताएं भी हैं, हालांकि इनके वैज्ञानिक प्रमाणों को अलग नजरिए से समझना जरूरी है।
लाल चींटी की चटनी खाई है आपने? चींटियों से बनती है ये अनोखी चटनी, स्वाद के साथ जुड़ी है आदिवासी परंपरा
लाल चींटी की पारंपरिक चटनी

भारत के कई आदिवासी इलाकों में खानपान की ऐसी परंपराएं आज भी देखने को मिलती हैं, जिनके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। लाल चींटी की चटनी भी इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में शामिल है। लाल चींटियों और उनके अंडों से तैयार होने वाली इस चटनी को स्थानीय लोग खास स्वाद के लिए खाते हैं। इसे कुछ क्षेत्रों में काजई या चापड़ा चटनी के नाम से भी जाना जाता है। इसकी तैयारी में लाल चींटियों को उनके घोंसलों से सावधानी से इकट्ठा किया जाता है और फिर मिर्च, प्याज व अन्य सामग्री के साथ पीसा जाता है। यही पारंपरिक तरीका इसे बाकी चटनियों से अलग बनाता है।

पेड़ों से जुटाई जाती हैं लाल चींटियां

लाल चींटियां अक्सर पेड़ों की पत्तियों को जोड़कर अपना घोंसला बनाती हैं। आदिवासी समुदायों में इन्हें पारंपरिक तरीके से इकट्ठा किया जाता है। इस काम में काफी सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि चींटियों के काटने से तेज जलन और सूजन हो सकती है। घोंसले से चींटियों के साथ उनके अंडों को भी अलग किया जाता है और फिर चटनी तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होती है।

Nvidia Trailer Theft in California: चोरों के साथ धोखा, चुराए Nvidia के 2 ट्रेलर, अंदर नहीं मिले GPU, भरी थी 20 टन रेत

सिलबट्टे पर तैयार होती है खास चटनी

इस चटनी को बनाने में लाल चींटियों और उनके अंडों के साथ हरी मिर्च, प्याज, धनिया और नमक जैसी चीजें इस्तेमाल की जाती हैं। पारंपरिक तरीके में सबसे पहले मिर्च और चींटियों को सिलबट्टे पर पीसा जाता है। इसके बाद इसमें प्याज, धनिया और मसाले मिलाकर मिश्रण को अच्छी तरह पीस लिया जाता है। इससे गाढ़ी और तीखी चटनी तैयार होती है।

स्वाद के साथ जुड़ी है पुरानी परंपरा

लाल चींटी की चटनी सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि कई आदिवासी समुदायों की पुरानी खाद्य परंपरा का हिस्सा है। इसे स्थानीय मौसम, जंगल और उपलब्ध चीजों से जोड़कर देखा जाता है। कुछ जगहों पर इसे केले के पत्ते पर परोसने की परंपरा भी बताई जाती है। इसका खट्टा-तीखा स्वाद इसे दूसरी चटनियों से अलग पहचान देता है।

सेहत को लेकर क्या मान्यता है?

स्थानीय स्तर पर इस चटनी को प्रोटीन और दूसरे पोषक तत्वों का स्रोत माना जाता है। कुछ समुदाय सर्दी-जुकाम और दूसरी सामान्य परेशानियों में भी इसके सेवन की बात करते हैं। हालांकि किसी बीमारी के इलाज या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का दावा करने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण देखना जरूरी है। इसलिए इसे पारंपरिक भोजन के रूप में समझना ज्यादा सही है।

Gen Z Beige Flag: रिश्तों में क्या होता है 'बेज फ्लैग'? Red Flag से कितना अलग है ये ट्रेंड

GI टैग से मिली अलग पहचान

लाल चींटी से तैयार होने वाली चटनी को कुछ क्षेत्रों में भौगोलिक पहचान भी मिली है। इसकी खासियत सिर्फ इसका स्वाद नहीं, बल्कि इससे जुड़ी स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान भी है। जंगल से मिलने वाली सामग्री को भोजन में बदलने की यह परंपरा आज भी कई समुदायों की पहचान बनी हुई है।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी)| एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारियों...Read More

Latest Posts