Garima Vishwakarma
24 Jan 2026
नई दिल्ली। भारत में नकली कृषि उत्पादों का खतरा अब केवल किसानों की आजीविका तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा, मिट्टी के स्वास्थ्य और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। राष्ट्रीय किसान प्रोग्रेसिव एसोसिएशन (आरकेपीए) ने प्रेस सम्मेलन में इस संकट को अभूतपूर्व पैमाने का और खतरनाक रूप से व्यवस्थित बताते हुए सरकार से युद्धस्तर पर कार्रवाई की मांग की। इस सम्मेलन का नेतृत्व आरकेपीए अध्यक्ष बिनोद आनंद और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने किया।
आरकेपीए का कहना है कि नकली उर्वरकों, कीटनाशकों, बीजों और कृषि उपकरणों का व्यापार अब एक सुव्यवस्थित सिंडीकेट का रूप ले चुका है। यह गिरोह कृषि सीजन खासतौर पर रबी और खरीफ के समय से पहले बाजार को जाली उत्पादों से भर देता है। हाल ही में 25 जून को हापुड़ में एक लाख से अधिक नकली उर्वरक बैग जब्त किए गए, जो कथित रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में भेजे जा रहे थे।
इन जाली उत्पादों की पैठ ग्रामीण बाजारों में इतनी गहरी है कि कई किसान इनसे अनजाने में ही प्रभावित हो जाते हैं। वे उधारी लेकर ये उत्पाद खरीदते हैं और जब फसल नष्ट हो जाती है, तो न केवल आर्थिक संकट का सामना करते हैं, बल्कि मानसिक पीड़ा और सामाजिक अपमान भी झेलते हैं।
आरकेपीए ने स्पष्ट रूप से बताया कि मौजूदा नियमों में भारी खामियां हैं। देश की कृषि इनपुट निगरानी प्रणाली बेहद कमजोर साबित हो रही है, जिससे अपराधियों को जाली उत्पादों के निर्माण और वितरण का भरपूर अवसर मिल रहा है। पंजीकरण प्रक्रियाएं, गुणवत्ता नियंत्रण और निर्यात मंजूरी में भारी चूकें हैं। कई शेल्फ कंपनियां और नकली ब्रांड सीआईबीआरसी (केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति) की अनुमतियों का दुरुपयोग कर रही हैं।
संगठन का आरोप है कि रासायनिक व्यापार में यह ढील, भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरा बन चुकी है। नकली कृषि उत्पादों का निर्माण और उनका नियंत्रित क्षेत्रों में निर्यात, आतंकवादी नेटवर्क तक पहुंच का माध्यम भी बन सकता है।
प्रेस सम्मेलन में भाग ले रहे किसानों ने अपनी पीड़ाएं साझा कीं। कई ने बताया कि उन्होंने जाली बीजों और नकली कीटनाशकों पर भरोसा करके पूरी फसल गंवा दी। खासतौर पर वे किसान जो नई तकनीक अपना रहे हैं, वे भी इस सिंडीकेट से प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीण भारत के कई इलाकों में किसान आज एक गहरे संकट से गुजर रहे हैं जहां न तो उन्हें कोई सुरक्षा मिल रही है और न ही जवाबदेही तय की जा रही है।
धर्मेंद्र मलिक ने कहा, “नकली कृषि इनपुट फैलना सिर्फ एक आर्थिक धोखा नहीं है, बल्कि यह किसानों की मेहनत और भरोसे पर सीधा हमला है। सरकार को जमीन स्तर पर कड़ी निगरानी और सख्त कार्रवाई करनी होगी, नहीं तो इसका नुकसान गांवों और किसानों को लंबे समय तक भुगतना पड़ेगा।”
संगठन ने सरकार के सामने नीति-परिवर्तन संबंधी मांगों का एक विस्तृत प्रस्ताव रखा है। इसके तहत 2015 से 2025 के बीच सभी कृषि इनपुट अनुमतियों की राष्ट्रीय सुरक्षा जांच, उच्च जोखिम वाले निर्यात पर अस्थायी रोक, सीआईबीआरसी के ढांचे में गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालयों की भागीदारी और सुरक्षा मंजूरी को अनिवार्य करने की मांग की गई है।
इसके अतिरिक्त सभी रेगुलेटेड कृषि इनपुट्स पर QR कोड आधारित सत्यापन प्रणाली लागू करने की सिफारिश की गई है, ताकि किसान मोबाइल डिवाइस से उत्पाद की प्रमाणिकता जांच सकें। साथ ही, डीलरों, वितरकों और अनधिकृत विक्रेताओं की जांच, छापे और निगरानी को सशक्त करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।
आरकेपीए ने एक राष्ट्रीय आयोग के गठन की भी मांग की है जिसमें NIA, RAW, DRDO, FSSAI, DEA और कृषि मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हों। इसका उद्देश्य भारत की रासायनिक निगरानी प्रणाली को फिर से परिभाषित करना है, जिससे कृषि के साथ-साथ फार्मा और इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में भी पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।