Raipur:छत्तीसगढ़ की बेटी अमिता श्रीवास ने रचा इतिहास,8848 मीटर पर फहराया तिरंगा

प्रेम कुमार,रायपुर:छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा की बेटी अमिता श्रीवास ने अपने अदम्य साहस, संघर्ष और जुनून से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर प्रदेश का नाम रोशन किया है। कभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में सीमित संसाधनों के बीच जीवन गुजारने वाली अमिता ने 22 मई 2026 को 8848 मीटर ऊंचे एवरेस्ट शिखर पर तिरंगा फहराया। उनके इस सफर में आर्थिक तंगी, बर्फीली हवाएं, ऑक्सीजन की कमी, मौत का खौफ और साथियों की दर्दनाक मौत जैसी कई मुश्किलें सामने आईं, लेकिन अमिता ने हर चुनौती को पीछे छोड़ते हुए इतिहास रच दिया।

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गरीबी के घर से एवरेस्ट की चोटी तक पहुंची छत्तीसगढ़ की बेटी
अमिता श्रीवास की कहानी किसी बड़े पर्वतारोही परिवार से शुरू नहीं हुई। जांजगीर-चांपा जिले के चांपा स्थित लोहारपारा में उनके पिता जैतराम श्रीवास छोटी-सी सैलून चलाते हैं। इसी सीमित आमदनी से पांच बेटियों और दो बेटों का पालन-पोषण हुआ।

माउंट आबू में पहली बार जगी एवरेस्ट की उड़ान
पर्वतारोहण की दुनिया में अमिता का पहला कदम अपनी सहेली क्षमा राजपूत के साथ माउंट आबू में पड़ा। पहाड़ों को करीब से देखने और चढ़ाई का अनुभव लेने के बाद उनके मन में ऊंची चोटियों को फतह करने का सपना जन्मा। यही सपना आगे चलकर उन्हें दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक ले गया।
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2018 में पर्वतारोहण की ट्रेनिंग, मुश्किलों से नहीं मानी हार
अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए अमिता ने वर्ष 2018 में पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स किया। इसके बाद सिक्किम में 28 दिन का एडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण हासिल किया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने प्रशिक्षण पूरा किया। सीमित आय में प्रशिक्षण की फीस जुटाना भी उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
किलिमंजारो ने बदली जिंदगी, बनीं अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही
अमिता के सफर में बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्हें अफ्रीका के सबसे ऊंचे पर्वत किलिमंजारो अभियान में शामिल होने का अवसर मिला। अभियान के लिए जरूरी रकम जुटाना आसान नहीं था। कलेक्टर के माध्यम से जनरेशन कंपनी ने उनकी यात्रा के लिए पहली बार आर्थिक सहयोग दिया। 8 मार्च 2021 को विश्व महिला दिवस के अवसर पर अमिता ने किलिमंजारो पर सफल चढ़ाई की। इसके साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ की पहली अंतरराष्ट्रीय महिला पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल किया।
बिना जूतों के अभ्या, फिर भी लक्ष्य से नहीं हटीं
अमिता के संघर्ष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभ्यास के दौरान कई बार उन्हें बिना जूतों के भी मेहनत करते देखा गया। उनके गांव के रमेश कुमार श्रीवास के मुताबिक, अभावों के बावजूद अमिता लगातार अभ्यास करती रहीं। उनकी मेहनत और अनुशासन ने यह साबित कर दिया कि सफलता के लिए सबसे बड़ा हथियार संसाधन नहीं, बल्कि संकल्प होता है।

अब सामने था दुनिया का सबसे बड़ा लक्ष्य,माउंट एवरेस्ट
किलिमंजारो की सफलता के बाद अमिता के सामने अगली चुनौती थी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट। एवरेस्ट अभियान के लिए करीब 50 लाख रुपये की फीस और अन्य खर्च बड़ी चुनौती थे। राज्य शासन और कलेक्टर की अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी की ओर से उन्हें आर्थिक सहायता मिली।
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9 अप्रैल को शुरू हुआ एवरेस्ट का सफर
अमिता 9 अप्रैल को ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुईं। इसके बाद काठमांडू और फिर एवरेस्ट बेस कैंप तक का सफर तय किया। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। करीब 6500 मीटर की ऊंचाई पर खराब मौसम के कारण अभियान रोकना पड़ा। इंतजार के दौरान उन्होंने अपने साथ ले जाए गए छत्तीसगढ़ी व्यंजनों गोंद के लड्डू, ठेठरी, खुरमी और सलौनी से समय बिताया।
बर्फ, तूफान और कम ऑक्सीजन,हर कदम पर मौत का खतरा
एवरेस्ट की चढ़ाई किसी रोमांच से ज्यादा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष थी। कड़ाके की ठंड, बर्फीली हवाएं, बेहद कम ऑक्सीजन और खतरनाक रास्तों ने अभियान को बेहद कठिन बना दिया। रातभर धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता था। रास्ते में दिखाई देने वाले पर्वतारोहियों के शव इस बात का खौफनाक एहसास कराते थे कि एवरेस्ट पर एक छोटी सी चूक भी जानलेवा हो सकती है।

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आंखों के सामने साथी पर्वतारोही की मौत
अभियान के दौरान अमिता ने बेहद भयावह दृश्य देखा। रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु के पर्वतारोही संदीप आरे स्नो ब्लाइंडनेस की चपेट में आए। उनकी आंखों के कॉर्निया को नुकसान पहुंचा और बाद में उनकी मौत की जानकारी मिली। अमिता इस सदमे से उबर भी नहीं पाई थीं कि एक और हादसे ने अभियान दल को झकझोर दिया।
शिखर से सिर्फ 100 मीटर पहले अरुण तिवारी की मौत
हैदराबाद के पर्वतारोही अरुण तिवारी की एवरेस्ट शिखर से महज करीब 100 मीटर पहले अचानक मौत हो गई। एक के बाद एक हादसों के बावजूद अमिता ने अपना हौसला नहीं खोया। उनके शेरपा दावा गैल्जिन लगातार उनका उत्साह बढ़ाते रहे और उन्हें अपने लक्ष्य की याद दिलाते रहे।
800 मीटर की चढ़ाई में लगे पूरे 21 घंटे
एवरेस्ट अभियान के अंतिम चरण में अमिता के लिए सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई। ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे करीब 800 मीटर की चढ़ाई पूरी करने में उन्हें लगभग 21 घंटे लग गए। हर कदम बेहद सावधानी से रखना था। शरीर जवाब दे रहा था, ऑक्सीजन लगातार कम हो रही थी और मानसिक दबाव चरम पर था।फिर आया वह ऐतिहासिक पल...
22 मई 2026 को 8848 मीटर पर लहराया तिरंगा
22 मई 2026 को अमिता श्रीवास ने समुद्र तल से 8848 मीटर यानी करीब 29,031 फीट की ऊंचाई पर स्थित माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराया। यह सिर्फ एक पर्वत की चढ़ाई नहीं थी। यह आर्थिक अभाव, सामाजिक सीमाओं और तमाम मुश्किल परिस्थितियों के खिलाफ एक बड़ी जीत थी।

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असली परीक्षा शिखर पर नहीं, वापसी में हुई
एवरेस्ट पर पहुंचना जितना कठिन है, वहां से सुरक्षित लौटना उससे भी बड़ी चुनौती माना जाता है।अमिता के अनुसार, शिखर तक पहुंचने का उत्साह शरीर को आगे बढ़ाता है, लेकिन वापसी के समय शरीर पूरी तरह थक चुका होता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण सोचने और याद रखने की क्षमता तक प्रभावित होने लगती है।
ऑक्सीजन की कमी ने याददाश्त तक छीन ली
वापसी के दौरान कम ऑक्सीजन और अत्यधिक थकान का असर अमिता पर भी पड़ा। उन्हें रास्ते का पूरा घटनाक्रम याद नहीं रहा। कुछ स्थानों पर शरीर और मस्तिष्क के बीच तालमेल बनाए रखना भी मुश्किल हो गया। इसके बावजूद उन्होंने धीरे-धीरे नीचे उतरना जारी रखा।
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42 दिन बाद बेस कैंप पहुंचीं, लेकिन मुश्किलें खत्म नहीं हुईं
कठिन संघर्ष के बाद करीब 42 दिन में अमिता किसी तरह बेस कैंप तक पहुंचीं। लेकिन यहां भी एक नई समस्या उनका इंतजार कर रही थी। लगातार बर्फीले वातावरण में रहने के कारण उनकी उंगलियों में फ्रॉस्टबाइट की समस्या हो गई। स्थिति को देखते हुए उन्हें बेस कैंप से हेलीकॉप्टर के जरिए काठमांडू ले जाया गया। वहां करीब एक सप्ताह तक उनका उपचार चला। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्होंने भारत वापसी की।

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अमिता की कहानी सिर्फ एवरेस्ट की नहीं, हौसले की कहानी है
अमिता श्रीवास की कहानी बताती है कि बड़े सपनों के लिए बड़ा बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि बड़ा हौसला जरूरी है। चांपा की एक साधारण परिवार की बेटी ने आर्थिक अभावों, कठिन प्रशिक्षण, खराब मौसम, कम ऑक्सीजन और अभियान के दौरान सामने आई त्रासदियों के बीच अपने लक्ष्य को हासिल किया। एवरेस्ट की चोटी पर फहराया गया तिरंगा अमिता के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक बन गया है।




















