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CG NEWS:आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आरोपी की बरी बरकरार रखी

हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी- बालिग महिला यदि परिणामों को समझते हुए संबंध बनाती है तो उसे सहमति माना जाएगा, ट्रायल कोर्ट का फैसला कायम। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल आरोप लगा देने से दुष्कर्म साबित नहीं हो जाता। यदि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे, तो भारतीय कानून के अनुसार इसे रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
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आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आरोपी की बरी बरकरार रखी

RAIPUR /BILASPUR NEWS। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा कानूनी संदेश देते हुए कहा है कि यदि कोई बालिग महिला परिणामों को समझते हुए अपनी इच्छा से शारीरिक संबंध बनाती है तो उसे कानून की नजर में सहमति माना जाएगा। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने सरगुजा जिले के बहुचर्चित मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए पीड़िता की अपील खारिज कर दी।

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CG High Court का बड़ा फैसला

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल आरोप लगा देने से दुष्कर्म साबित नहीं हो जाता। यदि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे, तो भारतीय कानून के अनुसार इसे रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। 

क्या था पूरा मामला?

मामला सरगुजा जिले के अंबिकापुर स्थित मणिपुर चौकी क्षेत्र का है। 40 वर्षीय महिला ने आरोप लगाया था कि 15 जून 2018 की रात शौचालय से लौटते समय आरोपी रामेश्वर दास ने मारपीट कर जान से मारने की धमकी दी और उसके साथ दुष्कर्म किया।

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फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को मिली हाई कोर्ट की मुहर

फास्ट ट्रैक कोर्ट, सरगुजा ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसे अब खारिज कर दिया गया है।

हाई कोर्ट ने किन आधारों पर दिया फैसला?

हाई कोर्ट ने पीड़िता के बयान, गवाहों के कथनों और उपलब्ध दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि घटना के दौरान दोनों के बीच बातचीत हुई थी तथा रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियां आपसी सहमति की ओर संकेत करती हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले कैनी राजन बनाम केरल राज्य का उल्लेख करते हुए कहा कि सहमति केवल मौन आत्मसमर्पण नहीं बल्कि सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होती है।

मेडिकल रिपोर्ट भी बनी अहम आधार

अदालत ने डॉ. रोजलिन आर. एक्का की मेडिकल रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई और दर्ज चोटों का समय भी कथित घटना से मेल नहीं खाता था। इसे भी अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।

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बालिग की स्वतंत्र सहमति का कानून में विशेष महत्व

खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई बालिग महिला अपने निर्णय और उसके परिणामों को समझते हुए संबंध बनाती है, तो इसे स्वैच्छिक सहमति माना जाएगा। ऐसे मामलों में केवल बाद में लगाए गए आरोप के आधार पर दुष्कर्म का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता।

Prem Nirmalkar
By Prem Nirmalkar
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