सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: तेज सुनवाई का अधिकार आरोपी के साथ पीड़ित का भी, गैंगस्टर्स एक्ट के लंबित केस से नहीं रुकेगा दूसरा ट्रायल

सुप्रीम कोर्ट ने तेज सुनवाई के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी तक सीमित नहीं है बल्कि पीड़ित को भी समय पर न्याय पाने का समान अधिकार है। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी के खिलाफ चल रहे हत्या के मुकदमे की सुनवाई को इस आधार पर रोक दिया गया था कि उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के तहत मामला पहले से लंबित है।
गैंगस्टर्स एक्ट की वजह से हत्या का ट्रायल रोकने की मांग
मामले में आरोपी ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 की धारा 12 का हवाला दिया था। इस प्रावधान के तहत गैंगस्टर्स एक्ट से जुड़े मामलों की सुनवाई को अन्य सामान्य आपराधिक मामलों पर प्राथमिकता दी जाती है। आरोपी की दलील थी कि जब तक गैंगस्टर्स एक्ट के तहत चल रहा मामला पूरा नहीं हो जाता, तब तक उसके खिलाफ हत्या के मामले की सामान्य आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़नी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
प्राथमिकता का मतलब दूसरी कार्यवाही पर रोक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 का उद्देश्य दूसरी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रोक देना नहीं है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अगर दोनों मामलों की तारीख एक साथ पड़ती है, तो गैंगस्टर्स एक्ट के तहत चल रहे मामले को प्राथमिकता दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि धारा 12 को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि गैंगस्टर्स एक्ट की कार्यवाही पूरी होने तक आरोपी के खिलाफ दूसरे अपराध का ट्रायल ही रोक दिया जाए।
पीड़ित के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि तेज सुनवाई का अधिकार आरोपी का विशेषाधिकार भर नहीं है, बल्कि पीड़ित का भी महत्वपूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुकदमे के निपटारे में अत्यधिक देरी का असर सिर्फ संबंधित पक्षों पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी की व्याख्या स्वीकार करने से वह गैंगस्टर्स एक्ट में लंबित कार्यवाही का हवाला देकर अपने खिलाफ चल रहे अन्य मामलों की सुनवाई में देरी करवा सकता है। कोर्ट ने ऐसी व्याख्या को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना।
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संविधान के अनुच्छेद 21 का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 को इस तरह समझा जाए कि उसके तहत लंबित मामला पूरा होने तक अन्य सभी आपराधिक मुकदमे रोक दिए जाएं, तो इससे संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले न्याय और जीवन के अधिकार से जुड़ी त्वरित सुनवाई की अवधारणा प्रभावित होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की ऐसी व्याख्या स्वीकार नहीं की जा सकती, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हो और पीड़ित को न्याय मिलने में लंबा इंतजार करना पड़े।
2013 के फैसले का भी दिया संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने धर्मेंद्र कीर्थल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, (2013) 8 SCC 368 के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में कहा गया था कि गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 का उद्देश्य सामान्य आपराधिक मामलों की सुनवाई में देरी करना नहीं है। कोर्ट ने माना कि यदि IPC के तहत अपराध के मामले में ट्रायल आगे बढ़ चुका है, तो केवल गैंगस्टर्स एक्ट की कार्यवाही लंबित होने के आधार पर सेशंस ट्रायल को रोकने का कोई औचित्य नहीं है।
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हाईकोर्ट का आदेश रद्द, ट्रायल आगे बढ़ा
इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अपील मंजूर कर ली और हत्या के मुकदमे की सुनवाई रोकने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। मामले में सेशंस कोर्ट के पहले के अंतरिम आदेश के तहत ट्रायल आगे बढ़ चुका था और आरोपी को दोषी भी ठहराया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सेशंस कोर्ट का दोषसिद्धि संबंधी फैसला अंतिम हो गया।












