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भारतीय वित्तीय इतिहास में 1 फरवरी 2017 का दिन विशेष महत्व रखता है। उस दिन तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में पहली बार समान्य केंद्रीय बजट के साथ रेल बजट पेश किया और 92 साल पुरानी परंपरा को समाप्त कर दिया। ब्रिटिश शासन से चली आ रही यह प्रथा वर्षों तक जारी रही, जिसमें रेल बजट अलग से पेश होता था।
रेल बजट का विलय केवल एक प्रशासनिक या कागजी बदलाव नहीं था, बल्कि यह भारतीय रेलवे को घाटे वाले विभाग से निकालकर आधुनिक और कुशल परिवहन ढांचे में बदलने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम था। आज वंदे भारत एक्सप्रेस, अमृत भारत स्टेशन योजना और कवच प्रणाली जैसी सफलताएं इसी वित्तीय मजबूती का परिणाम मानी जाती हैं।
रेल बजट को अलग पेश करने की परंपरा 1924 में शुरू हुई थी। यह फैसला एकवर्थ कमेटी (Acworth Committee) की सिफारिशों के आधार पर लिया गया। उस समय भारत की कुल अर्थव्यवस्था में रेलवे का योगदान लगभग 70-80% था, इसलिए बजट का बड़ा हिस्सा रेलवे के लिए निर्धारित किया जाता था।
साल 2016 में मोदी सरकार ने नीति आयोग की एक समिति की सिफारिश पर यह निर्णय लिया कि रेल बजट को समान्य केंद्रीय बजट में शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य रेलवे की वित्तीय और प्रशासनिक स्थिति को मजबूत करना था।
मुख्य कारण-
पुरानी परंपरा का खात्मा: 1924 के बाद रेलवे का जीडीपी में हिस्सा लगातार घटता गया। 2016 तक रेलवे का हिस्सा कम होने के कारण अलग बजट का कोई ठोस तर्क नहीं बचा।
वित्तीय बोझ और लाभांश: पहले रेलवे को केंद्र सरकार को हर साल लाभांश देना पड़ता था। विलय के बाद यह बोझ खत्म हो गया और रेलवे के पास अपने विस्तार के लिए अधिक धन उपलब्ध हुआ।
राजनीतिक लोकलुभावनवाद पर रोक: अलग बजट के दौरान रेल मंत्री अक्सर नई ट्रेनों की घोषणा करके वोट बैंक को खुश करते थे। विलय के बाद रेलवे शुद्ध रूप से परिवहन संगठन बनकर रह गया।
प्रशासनिक जटिलता में कमी: दो अलग बजटों के लिए अलग प्रक्रिया और लेखा-जोखा की जरूरत होती थी, जिससे समय और संसाधन बर्बाद होते थे। अब एक ही बजट होने से परियोजनाओं और फंड आवंटन में तेजी आई।
रेल और आम बजट के विलय से कई लाभ हुए हैं-
समग्र विकास की दृष्टि: अब सड़क, जलमार्ग, हवाई और रेलवे सहित सभी परिवहन साधनों का बजट एक साथ तय होता है। इससे मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी जैसे पीएम गति शक्ति योजना को बढ़ावा मिला।
पूंजीगत व्यय (Capex) में वृद्धि: रेलवे को बजटीय सहायता बढ़ी और अब रेल बजट 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक है।
वित्तीय स्वायत्तता: रेलवे को सरकार को लाभांश नहीं देना पड़ता, जिससे पैसे का इस्तेमाल सुरक्षा, आधुनिकीकरण और नई परियोजनाओं में किया जा सकता है।
निर्णय लेने में तेजी: वित्त मंत्रालय और रेल मंत्रालय के बीच समन्वय बेहतर हुआ, जिससे बड़ी परियोजनाओं जैसे बुलेट ट्रेन और वंदे भारत के लिए फंड जारी करना आसान हो गया।
1947-48: रेल बजट 14 करोड़ 28 लाख रुपए
2014-15: रेल बजट 63,363 करोड़ रुपए
2024-25: रेल बजट 2,62,200 करोड़ रुपए
रेल बजट के आकार में वृद्धि ने रेलवे को आधुनिक ट्रेनों और नई लाइनों के विस्तार में मदद की।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को देश का आम बजट पेश करेंगी। इस बजट में रेल बजट भी शामिल होगा। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारतीय रेलवे के लिए अनुमानित आवंटन 2.70 लाख करोड़ से 2.80 लाख करोड़ रुपए के बीच हो सकता है।
मुख्य उम्मीदें-
यात्रियों की सुविधा: जून तक 8 नई स्लीपर वंदे भारत ट्रेनें और पूरे वर्ष में 12 नई ट्रेनों का विस्तार।
अमृत भारत ट्रेनें: मध्य वर्ग के लिए पूर्ण एसी कोच वर्जन 3.0।
वेटिंग लिस्ट समस्या: अतिरिक्त कोच और नई पीढ़ी की ट्रेनों पर जोर।
स्टेशनों का कायाकल्प: अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत सैकड़ों स्टेशनों का आधुनिकीकरण।
ट्रैक और इंजन निर्माण: ट्रैक दोहरीकरण और पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी।
रेल बजट और आम बजट के विलय ने भारतीय रेलवे को सिर्फ वित्तीय स्वतंत्रता ही नहीं दी, बल्कि इसे एक आधुनिक और कुशल परिवहन संगठन में बदलने में मदद की।
आज रेलवे सिर्फ ट्रांसपोर्ट का साधन नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास और वित्तीय मजबूती का प्रतीक बन चुका है।
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