Aniruddh Singh
20 Jan 2026
Aniruddh Singh
19 Jan 2026
Aniruddh Singh
19 Jan 2026
नई दिल्ली। भारतीय रुपया 21 जनवरी को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर अब तक के सबसे निचले स्तर 91.74 तक पहुंच गया है। यह पिछले दो माह में एक ही सत्र में सबसे बड़ी गिरावट है। वैश्विक बॉन्ड बाजार में तेज बिकवाली और अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर जारी धमकियों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे पूंजी के बाहर जाने को लेकर आशंकाएं और गहरा दी हैं। लगातार छठे कारोबारी सत्र में गिरते हुए रुपया, डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर 91.74 स्तर तक फिसल गया। कारोबार के अंत में यह 0.8% की गिरावट के साथ 91.6950 पर बंद हुआ, जबकि पिछला बंद स्तर 90.9750 था। रुपया, एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा रही।
रुपए में जनवरी की शुरूआत से अब तक इसमें करीब 2% की गिरावट आ चुकी है, जबकि 2025 में रुपया लगभग 5% टूटा था। अमेरिका में शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई, एसएंडपी 500 जैसे प्रमुख सूचकांक करीब 2% टूटे। इसके साथ ही निवेशकों के बीच फिर से सेल अमेरिका जैसी सोच उभरने लगी, यानी अमेरिकी परिसंपत्तियों से भी पैसा निकलने लगा। हालांकि डॉलर इंडेक्स कमजोर हुआ, लेकिन उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बना रहा, क्योंकि वैश्विक निवेशक जोखिम भरे निवेश से दूरी बनाने लगे। एक और अहम कारण विदेशी निवेशकों का भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना है। सिर्फ एक दिन में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 2,938 करोड़ रुपए के शेयर बेच दिए।
जब विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपए को डॉलर में बदलते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है। इसी वजह से सेंसेक्स और निफ्टी में भी तेज गिरावट देखी गई, जिसने निवेशकों की धारणा को और नकारात्मक बना दिया। वैश्विक स्तर पर जापान के बॉन्ड बाजार में बिकवाली और वहां बॉन्ड यील्ड का रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचना भी जोखिम भावना को कमजोर करने वाला कारक बना। इसके अलावा, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा व्यापार युद्ध जैसी भाषा को फिर से हवा देना और ग्रीनलैंड से जुड़े विवाद ने भू-राजनीतिक तनाव बढ़ाया। ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित ठिकानों की तलाश करते हैं और उभरते बाजारों से दूरी बना लेते हैं।
रुपए की तेज गिरावट को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार में हस्तक्षेप किया। बैंकरों के मुताबिक, आरबीआई ने डॉलर बेचकर रुपए को सहारा देने की कोशिश की, जिससे गिरावट कुछ हद तक सीमित रही। फिर भी, दिन के दौरान रुपया 91.5 तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इस कमजोर रुपये का असर कई स्तरों पर पड़ता है। आयात महंगा हो जाता है, खासकर कच्चा तेल, गैस और इलेक्ट्रॉनिक सामान, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। विदेश में पढ़ाई या इलाज कराने वालों के लिए खर्च बढ़ जाता है। वहीं, निर्यातकों को कुछ हद तक फायदा होता है, क्योंकि उन्हें डॉलर में मिलने वाली कमाई रुपए में बदलने पर ज्यादा मिलती है।