PU Special :भोपाल 2047 मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार, पुरानी सड़कों से लेकर नए मोहल्लों तक बदल जाएगा शहर

भोपाल अब सिर्फ आज की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि 2047 के शहर के रूप में आकार लेने की तैयारी कर रहा है। भोपाल विकास योजना-2047 का प्रारूप सामने आ गया है। करीब दो दशक पुराने 2005 के मास्टर प्लान के मुकाबले इस बार योजना का दायरा सिर्फ जमीन के उपयोग और सड़कों तक सीमित नहीं है।
भोपाल 2047 मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार, पुरानी सड़कों से लेकर नए मोहल्लों तक बदल जाएगा शहर
भोपाल 2047 मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार

भोपाल। इसमें आवास, रोजगार, परिवहन, पानी, सीवर, वर्षा जल निकासी, कचरा प्रबंधन, झीलें, जंगल, विरासत क्षेत्र, पार्किंग और आसपास के शहरों से कनेक्टिविटी को एक साथ देखने की कोशिश की गई है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब भोपाल को अकेले शहर की तरह नहीं, बल्कि सीहोर, मंडीदीप, रायसेन, विदिशा, बैरसिया और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े महानगरीय  रूप में देखने का प्रस्ताव है। इसके लिए महानगरीय स्तर पर विकास और परिवहन के समन्वय की व्यवस्था का खाका दिया गया है।

पहले समझिए:2005 से 2047 तक मास्टर प्लान कितना बदला

भोपाल का 2005 का विकास योजना क्षेत्र 601.06 वर्ग किलोमीटर और 146 गांवों का था। उस योजना में तेजी से बढ़ती आबादी को समायोजित करने के लिए आत्मनिर्भर उपनगर, प्रभावी सार्वजनिक परिवहन, भौतिक-सामाजिक अधोसंरचना और सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था पर जोर था। इसके बाद 2021 के प्रारूप में निवेश क्षेत्र बढ़ाकर 813.92 वर्ग किमी और 196 गांव किया गया। 2031 के प्रारूप में यह बढ़कर 1016.90 वर्ग किमी और 254 गांव हो गया। 2031 के प्रारूप को 2024 में 2047 की जरूरतों के हिसाब से नई योजना तैयार करने और शहर के हितधारकों से दोबारा चर्चा के निर्देश के साथ वापस किया गया। यानी 2047 का प्रारूप अचानक तैयार किया गया नया खाका नहीं है। यह 1991 और 2005 की योजनाओं से आगे बढ़ते हुए 2021 और 2031 के प्रारूपों की समीक्षा का अगला चरण है।

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क्या नया है? शहर की पूरी तस्वीर बदलने वाले 10 बड़े बदलाव

मास्टर प्लान ड्राफ्ट में भोपाल और आसपास के क्षेत्रों के लिए महानगरीय स्तर की योजना की बात है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में सड़क, सार्वजनिक परिवहन, पानी, सीवर, औद्योगिक विकास और दूसरे बड़े काम सिर्फ नगर निगम की सीमा देखकर नहीं, बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र को ध्यान में रखकर किए जाने की दिशा में बढ़ेंगे। प्रस्ताव में महानगरीय विकास और निवेश योजना के साथ एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण जैसी व्यवस्था का भी उल्लेख है, ताकि अलग-अलग विभागों और एजेंसियों के परिवहन कामों में बेहतर तालमेल हो।

सड़कें सिर्फ चौड़ी नहीं होंगी, उनका पूरा नेटवर्क बदलेगा

ड्राफ्ट में भोपाल की मौजूदा सड़क व्यवस्था की कई कमियां गिनाई गई हैं भीड़ भाड़, लंबे सफर का समय, फुटपाथ की कमी, पार्किंग की समस्या, पैदल और साइकिल नेटवर्क का अभाव, सार्वजनिक परिवहन के बीच कम समन्वय और अधूरे सड़क संपर्क।

  • अब सड़कों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव हैमुख्य मार्ग : 45 से 75 मीटर
  • द्वितीयक मुख्य मार्ग : 30 से 45 मीटर
    उप मुख्य मार्ग : करीब 30 मीटर
  • सेक्टर मार्ग : 18 से 24 मीटर
    सब-सेक्टर मार्ग : 12 से 18 मीटर
  • स्थानीय मार्ग : 15 से 20 मीटर
  • 30 मीटर वाले कुछ मार्गों पर साइकिल ट्रैक शामिल करने का प्रस्ताव भी है।
  • प्रस्तावित सड़क नेटवर्क की कुल लंबाई करीब 791.42 किमी बताई गई है। इसमें 18, 24, 30, 45 और 60 मीटर चौड़ी सड़कों का नेटवर्क शामिल है।

नर्मदापुरम,रायसेन,इंदौर,बैरसिया,विदिशा रोड का दबाव बांटने की तैयारी

मास्टर प्लान में इन प्रमुख मार्गों पर बढ़ते यातायात दबाव को कम करने के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रस्तावित करने की बात है। जहां 2005 में प्रस्तावित सड़कें जमीन पर नहीं बन सकीं, वहां हर सड़क को उसी रूप में लागू करने के बजाय वैकल्पिक रूट देने का रास्ता अपनाया गया है। यानी पुराना नक्शा जस का तस लागू करने के बजाय जमीन की मौजूदा स्थिति देखकर नेटवर्क को बदलने की कोशिश की गई है। यही इस प्रारूप का एक अहम बदलाव है।

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सिर्फ सड़क नहीं,पैदल चलने वाले और साइकिल सवार भी योजना में

प्रारूप में कम्प्लीट स्ट्रीट की अवधारणा रखी गई है। यानी सड़क को सिर्फ कार और बस के लिए नहीं, बल्कि पैदल चलने वालों और दूसरे साधनों के लिए भी उपयोगी बनाने की बात है। प्रस्तावित कामों में पैदल यात्री नेटवर्क, सुरक्षित पैदल रास्ते, साइकिल नेटवर्क, पार्किंग प्रबंधन, भीड़ वाले व्यावसायिक मार्गों की पार्किंग योजना, सड़क से बाहर पार्किंग, ट्रांजिट नोड के आसपास सुविधाएं शामिल हैं। मास्टर प्लान लागू होने से छोटी दूरी के लिए हर काम में वाहन निकालने की जरूरत कम करने की दिशा बन सकती है। हालांकि यह प्रभाव तभी आएगा जब प्रस्ताव जमीन पर लागू होंगे।

मेट्रो के आसपास नया विकास मॉडल

प्रारूप में मेट्रो लाइनों के साथ ट्रांजिट आधारित विकास गलियारे (कॉरिडोर) बनाने का प्रस्ताव है। यानी मेट्रो स्टेशन के आसपास सिर्फ स्टेशन बनाकर छोड़ने के बजाय वहां आवास, काम, व्यापार और दूसरी सुविधाओं के विकास को परिवहन से जोड़ने की सोच है। इससे भविष्य में मेट्रो स्टेशन के आसपास के इलाके ज्यादा गतिविधि वाले क्षेत्र बन सकते हैं।

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पानी की सबसे बड़ी चुनौती, 82 फीसदी क्षेत्र में नेटवर्क

प्रारूप के मुताबिक वर्तमान में भोपाल के करीब 82 प्रतिशत क्षेत्र में जल आपूर्ति नेटवर्क उपलब्ध है। बढ़ती आबादी के कारण नई पाइपलाइन और नेटवर्क विस्तार की जरूरत बताई गई है। योजना में जल शोधन संयंत्र, जलाशय और पंपिंग स्टेशनों के लिए जमीन चिन्हित करने पर भी जोर है। यानी 2047 की योजना सिर्फ यह नहीं बताती कि कहां मकान बनेंगे, बल्कि यह भी देखती है कि उन मकानों तक पानी पहुंचाने के लिए जमीन और ढांचा कहां होगा।

सीवर:अभी 28-30 फीसदी, आबादी, लक्ष्य 100 फीसदी शहर

यह सबसे बड़ा बुनियादी बदलाव हो सकता है। प्रारूप के अनुसार नगर निगम क्षेत्र में करीब 314 किमी भूमिगत सीवर नेटवर्क और करीब 67 एमएलडी उपचार क्षमता है, जिससे लगभग 28-30 प्रतिशत आबादी को सेवा मिल रही है। 2047 के लिए प्रस्ताव है कि पूरे शहर को सीवर नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में काम किया जाए। नालियों में सिर्फ बारिश का पानी रहे और सीवेज को सीवर लाइन के जरिए उपचार संयंत्र तक पहुंचाया जाए। औद्योगिक अपशिष्ट के प्राथमिक उपचार की भी बात है। मतलब जहां अभी बारिश में नालियों में गंदा पानी और सीवेज मिलने की समस्या है, वहां भविष्य में अलग व्यवस्था बनाने की योजना है।

हर दिन करीब 1550 टन कचरे के लिए वैज्ञानिक व्यवस्था

प्रारूप में अनुमान है कि 2047 तक करीब 1550 मीट्रिक टन प्रतिदिन ठोस और जैव-चिकित्सा कचरे के संग्रहण, परिवहन और निपटान के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक व्यवस्था लागू की जा सके। यानी कचरा प्रबंधन को भी शहर की भविष्य की अधोसंरचना का हिस्सा माना गया है।

बारिश का पानी अब मास्टर प्लान का बड़ा मुद्दा

प्रारूप ने माना है कि भोपाल की प्राकृतिक जल निकासी कई हिस्सों में अच्छी है, लेकिन कई सड़कों पर जल निकासी की व्यवस्था नहीं है। प्राथमिक और द्वितीयक नालों की क्षमता बढ़ाने, गाद निकालने और प्रमुख नालों की क्षमता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। इसका सीधा संबंध बारिश के समय होने वाले जलभराव से है। यानी सड़क बनाने के साथ अब उसके साथ नाली और जल निकासी को भी योजना का हिस्सा बनाने की जरूरत को स्वीकार किया गया है।

अब कॉलोनी का मतलब सिर्फ मकान नहीं,आत्मनिर्भर मोहल्ले

आवासीय योजना में बड़ा बदलाव आत्मनिर्भर मोहल्लों की सोच है। ड्राफ्ट में ऐसे आवासीय क्षेत्रों की कल्पना है जहां घर के आसपास ही छोटी दुकानें, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूल और सामाजिक सुविधाएं, खरीदारी, मनोरंजन, सामुदायिक सुविधाएं मिल सकें। साथ ही निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए किफायती आवास, प्रवासी और काम के लिए आने वाली आबादी के लिए किराये के मकान, बेघर लोगों के लिए नाइट शेल्टर और झुग्गी क्षेत्रों के पुनर्विकास की जरूरत भी दर्ज की गई है।

पुराने मकान तोड़कर ऊंची इमारतें,ड्राफ्ट ने लगाई शर्त

पुराने विकसित इलाकों में एकल परिवार के लिए बने भूखंडों को बहु-इकाई आवास में बदलने का चलन बढ़ने की बात प्रारूप में कही गई है।
लेकिन ऐसी इमारतों से पानी, सीवर, पार्किंग और दूसरी सुविधाओं पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए बहु-इकाई विकास को आवश्यक सुविधाएं और अधोसंरचना सुनिश्चित करने से जोड़ा गया है। यानी जहां पहले एक भूखंड पर एक मकान था, वहां ज्यादा परिवार रह सकते हैं, लेकिन उसके साथ पानी, सीवर और पार्किंग की क्षमता भी देखनी होगी।

झील-जंगल भी मास्टर प्लान में,सिर्फ निर्माण नहीं

भोपाल की सबसे बड़ी पहचान झील और हरियाली है। प्रारूप में जल निकायों, उनके जलग्रहण क्षेत्र, वन क्षेत्र और पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों को विकास योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। प्रारूप में जल निकायों के आसपास संरक्षण, बफर क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करने, स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने और पेड़ों की जीआईएस आधारित पहचान जैसी सिफारिशें भी दर्ज हैं। वहीं नगर वन और वृक्षारोपण क्षेत्र के लिए अलग प्रावधान है। विकास योजना लागू होने के बाद शुरुआती वर्षों में पौधरोपण के लिए जगह चिन्हित करने की जिम्मेदारी का भी बात है।

पुराने भोपाल के लिए अलग सोच

विरासत क्षेत्र को सिर्फ पुराने भवनों के रूप में नहीं देखा गया है। प्रारूप में पुराने भोपाल और विरासत क्षेत्रों के संरक्षण के साथ पैदल मार्ग विकसित करने की जरूरत बताई गई है। विरासत भवनों को बचाने के लिए टीडीआर जैसी व्यवस्था का सुझाव भी दिया गया है, ताकि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाया जा सके। इसका असर खास तौर पर चौक, पुराने बाजार और ऐतिहासिक इलाकों के भविष्य के विकास पर पड़ सकता है।

रोजगार के लिए नए औद्योगिक और लॉजिस्टिक क्षेत्र

प्रारूप में नए औद्योगिक क्षेत्रों को बड़े परिवहन मार्गों, माल परिवहन गलियारों और लॉजिस्टिक हब के पास विकसित करने की सोच है। लघु उद्योग, कृषि आधारित उद्योग, एमएसएमई क्लस्टर और तकनीकी पार्क के लिए जगह की जरूरत बताई गई है। औद्योगिक इलाकों में सिर्फ कारखाने नहीं, बल्कि श्रमिकों के आवास और साझा सुविधाओं जैसे सीवेज उपचार संयंत्र, कचरा उपचार और प्रयोगशालाओं के लिए भी जमीन रखने का सुझाव है। इससे रोजगार और आवास को एक-दूसरे से दूर रखने के बजाय साथ में विकसित करने की दिशा बनती है।

एक और बड़ा बदलाव:लॉजिस्टिक हब और ट्रांसपोर्ट नगर

शहर में माल आने-जाने की व्यवस्था को अलग नजर से देखा गया है। प्रमुख जंक्शनों पर लॉजिस्टिक पार्क, माल टर्मिनल और आधुनिक भंडारण केंद्र विकसित करने की जरूरत बताई गई है। उद्देश्य है कि भारी माल वाहनों का दबाव शहर की सामान्य यातायात व्यवस्था पर कम पड़े और सामान की आवाजाही व्यवस्थित हो। ट्रांसपोर्ट नगर के लिए न्यूनतम आंतरिक मार्ग 18 मीटर और पार्किंग के लिए 25 प्रतिशत क्षेत्र जैसे प्रावधान भी दिए गए हैं।

क्या 2047 का प्लान पूरी तरह नया है या नहीं? 

2005 का प्लान में शहर का विस्तार, उपनगर, सड़क, सार्वजनिक परिवहन और बुनियादी सुविधाएं शामिल थीं। जबकि 2047 के प्लान  में  शहर का विस्तार, महानगरीय क्षेत्र, एकीकृत परिवहन, पैदल/साइकिल नेटवर्क, मेट्रो आधारित विकास, लॉजिस्टिक हब, 100 फीसदी सीवेज नेटवर्क, आत्मनिर्भर मोहल्ले, किफायती किराये के आवास, जलग्रहण संरक्षण, नगर वन और विरासत संरक्षण की प्लानिंग है यानी सोच का दायरा बड़ा हुआ है।

लोगों की जिंदगी में क्या बदलेगा? 

  • अगर ड्राफ्ट की प्लानिंग जमीनी हकीकत बनती है तो इसका असर रोजमर्रा की जिंदगी पर इस तरह पड़ सकता है।
  • कई जगह यातायात जाम-वैकल्पिक मार्ग और व्यवस्थित सड़क नेटवर्क
    फुटपाथ की कमी-पैदल यात्री नेटवर्क
  • साइकिल के लिए कम जगह-साइकिल ट्रैक का प्रावधान
  • पार्किंग की समस्या-पार्किंग प्रबंधन और ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग
  • सीमित सीवर कवरेज-पूरे शहर को सीवर से जोड़ने का लक्ष्य
  • बारिश में जलभराव-नालों की क्षमता बढ़ाने और जल निकासी पर जोर
  • बिखरा हुआ आवासीय विकास-आत्मनिर्भर मोहल्ले
  • महंगा/सीमित आवास-किफायती और किराये के आवास पर जोर
  • उद्योग और घरों के बीच दूरी-उद्योग के पास आवास व सुविधाओं की योजना
  • शहर में भारी माल वाहनों का दबाव-लॉजिस्टिक पार्क और ट्रांसपोर्ट नगर
  • झीलों पर विकास का दबाव-जलग्रहण और बफर क्षेत्र संरक्षण
  • पुराने शहर में अनियोजित बदलाव-विरासत क्षेत्र और पैदल मार्ग
  • हरियाली का दबाव-नगर वन और वृक्षारोपण क्षेत्र
  • यह बदलाव अभी कागज पर प्रस्ताव हैं। इन्हें लागू करने के लिए आगे विस्तृत योजनाएं, जमीन, बजट, विभागीय मंजूरी और चरणबद्ध काम जरूरी होंगे।
Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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