बस्तर ओलंपिक में बच्चों की जान से खिलवाड़, 3 लाख का बजट, फिर भी मवेशियों की तरह पिकअप में ठूंसकर ढोए गए स्कूली खिलाड़ी

पीपुल्स अपडेट्स एक्सक्लूसिव: भूपेंद्र शांडिल्य कांकेर: छत्तीसगढ़ में ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने और गांवों के खिलाड़ियों को बड़ा मंच देने के दावों के बीच कांकेर से सामने आई तस्वीरें सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोलती नजर आ रही हैं। जिस बस्तर ओलंपिक को खेल प्रतिभाओं के प्रोत्साहन का उत्सव बताया जा रहा है, उसी आयोजन में स्कूली बच्चों की सुरक्षा कथित तौर पर भगवान भरोसे छोड़ दी गई। ग्रामीण इलाकों से प्रतियोगिता में शामिल होने पहुंचे बच्चों को सुरक्षित यात्री वाहनों के बजाय पिकअप में क्षमता से अधिक भरकर लाए जाने का मामला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि आयोजन के लिए शासन ने 3 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की है और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी जनपद पंचायत को सौंपी गई है। इसके बावजूद बच्चों के सुरक्षित परिवहन जैसी बुनियादी जरूरत पूरी नहीं हो सकी। सवाल सिर्फ पिकअप में बच्चों को बैठाने का नहीं, बल्कि उस पूरी सरकारी व्यवस्था का है, जो बजट, जिम्मेदारी और निगरानी होने के बावजूद बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाई।

3 लाख रुपये का बजट, लेकिन बच्चों के लिए सुरक्षित वाहन तक नहीं।
बस्तर ओलंपिक के आयोजन के लिए शासन की ओर से 3 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है। आयोजन की जिम्मेदारी जनपद पंचायत को दी गई है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ियों के लिए परिवहन, भोजन और अन्य जरूरी सुविधाओं का इंतजाम किया जा सके। लेकिन कांकेर में सामने आए मामले ने सरकारी खर्च और जमीनी व्यवस्था के बीच बड़ा अंतर उजागर कर दिया है। जब आयोजन के लिए बजट निर्धारित था, तो बच्चों को सुरक्षित वाहनों से लाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या परिवहन की योजना ही नहीं बनाई गई थी या फिर जिम्मेदार अधिकारियों ने व्यवस्था की निगरानी करना जरूरी नहीं समझा? बजट की राशि का वास्तविक उपयोग क्या हुआ, इसकी जांच अब जरूरी हो गई है।
खेल प्रतिभाओं को मंच देने निकली सरकार, रास्ते में बच्चों की सुरक्षा ही दांव पर।
पिकअप में ठूंसकर लाए गए बच्चे, हादसा होता तो जवाबदेह कौन होता? ग्रामीण अंचलों के बच्चे अपनी खेल प्रतिभा दिखाने और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए आयोजन स्थल पहुंचे थे। लेकिन उन्हें जिस तरीके से पिकअप वाहनों में बैठाकर लाया गया, उसने पूरे आयोजन की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिकअप में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाकर परिवहन करना गंभीर सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है। अचानक ब्रेक लगने, वाहन के अनियंत्रित होने या दुर्घटना की स्थिति में बच्चों की जान खतरे में पड़ सकती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को सुरक्षित आयोजन स्थल तक पहुंचाना भी यदि प्रशासन सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है, तो खेल आयोजन के दौरान उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है?
जनपद और जिला पंचायत सीईओ की जिम्मेदारी, फिर भी व्यवस्था नदारद।
बस्तर ओलंपिक में सुदूर इलाके से आये खिलाडियों को पिकअप में मवेशियों की तरह ठूंसकर ढोए गया। घटना की जानकारी पीपुल्स अपडेट्स के संवाददाता भूपेंद्र शांडिल्य ने जिला पंचायत के सीईओ हर्ष मांडवी से बच्चों के साथ हो रही बर्बरता के जानकारी दी प्रशासन के जवाबदार अधिकारी से सवाल पूछने पर अधिकारी मै इस मामले में कोई कुछ टाल मटोल जवाब देते हुए मेरी कार्य क्षेत्र के बाहर है काह कर कैमरा से बचते हुए नजर आए
सीईओ से लेकर मैदानी अमले तक जवाबदेही तय होनी चाहिए।
आयोजन की जिम्मेदारी जनपद पंचायत को सौंपी गई थी। ऐसे में परिवहन व्यवस्था की निगरानी और खिलाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की प्राथमिकता होनी चाहिए थी। क्या जनपद पंचायत के सीईओ ने आयोजन से पहले परिवहन व्यवस्था का निरीक्षण किया गया। क्या बच्चों को लाने के लिए वाहनों की क्षमता, सुरक्षा और जरूरी दस्तावेजों की जांच की गई। क्या आयोजन स्थल तक पहुंचने वाले बच्चों की जिम्मेदारी तय की गई। इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी भी व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े करती है। जिला प्रशासन को केवल आयोजन की औपचारिकताओं और मंचीय कार्यक्रमों तक सीमित रहने के बजाय जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं की जांच करनी चाहिए।

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छत्तीसगढ़ सरकार के खेल प्रोत्साहन अभियान पर बदइंतजामी का दाग।
योजनाएं कागजों में शानदार, लेकिन मैदान में बच्चों की सुरक्षा से समझौता क्यों? राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य बच्चों और युवाओं को खेल के क्षेत्र में अवसर देना है। लेकिन जब इसी आयोजन में खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो सरकारी दावों और वास्तविक व्यवस्थाओं के बीच अंतर साफ दिखाई देता है। खेल प्रतियोगिता में पदक जीतना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी खिलाड़ियों का सुरक्षित रहना है। सरकार की योजना का लाभ तभी सार्थक होगा, जब आयोजन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।
अब जिला प्रशासन से सीधा सवाल: कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा?
कांकेर में सामने आए इस मामले में जिला प्रशासन को तत्काल संज्ञान लेकर परिवहन व्यवस्था की जांच करानी चाहिए। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि बच्चों को किसके निर्देश पर पिकअप वाहनों में लाया गया और क्या इसके लिए कोई वैकल्पिक सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध थी। आयोजन के लिए स्वीकृत 3 लाख रुपये की राशि का मदवार हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परिवहन और खिलाड़ियों की सुविधाओं पर कितनी राशि खर्च की गई। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और आयोजन प्रबंधन के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला प्रशासन किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है या बच्चों की सुरक्षा के लिए समय रहते जवाबदेही तय करेगा?
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जिम्मेदारों से आम जनता का सीधा सवाल
स्कूली बच्चों को पिकअप में क्षमता से अधिक बैठाकर लाने की अनुमति किस अधिकारी ने दी?
शासन से स्वीकृत 3 लाख रुपये की राशि किस-किस मद में खर्च की गई?
बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए यात्री वाहनों की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या जनपद पंचायत के सीईओ ने आयोजन से पहले परिवहन व्यवस्था का निरीक्षण किया था?
बच्चों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारी और आयोजन प्रभारी कौन थे?
जिला प्रशासन परिवहन व्यवस्था और खर्च की निष्पक्ष जांच कब कराएगा?
यदि इस दौरान कोई दुर्घटना होती, तो बच्चों की जान की जिम्मेदारी कौन लेता?
खेल का मैदान प्रतिभा दिखाने के लिए है, बच्चों की जान जोखिम में डालने के लिए नहीं।




















