बस्तर ओलंपिक में खिलाड़ियों के हक का खाना तक डकार गई व्यवस्था, 50 से ज्यादा बच्चे भूखे लौटे, 2 लाख के बजट पर बड़ा सवाल

भूपेन्द्र शांडिल्य,कांकेर: चारामा में बस्तर ओलंपिक की भोजन व्यवस्था धड़ाम, थाली लेकर कतार में खड़े रहे स्कूली खिलाड़ी, खाना खत्म होने पर खाली पेट लौटने को हुए मजबूर; वायरल वीडियो ने खोली प्रशासन और खेल विभाग की पोल, कलेक्टर से लेकर जिला पंचायत CEO तक ने नहीं उठाया फोन बस्तर के आदिवासी अंचल में खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने, युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने और खेल के जरिए उनका भविष्य संवारने के सरकारी दावों की चारामा में ऐसी पोल खुली है, जिसने पूरे आयोजन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बस्तर ओलंपिक में शामिल होने पहुंचे 50 से अधिक स्कूली खिलाड़ी भोजन के अभाव में भूखे ही अपने गांव लौट गए। सुबह से खेल मैदान में पसीना बहाने वाले बच्चों को दोपहर में भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हुआ।
प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
थाली लेकर कतार में खड़े बच्चे इंतजार करते रहे और देखते ही देखते खाना खत्म हो गया। सबसे गंभीर बात यह है कि जिस आयोजन के लिए प्रत्येक ब्लॉक को दो लाख रुपये से अधिक का बजट दिए जाने की जानकारी सामने आई है, वहां खिलाड़ियों के लिए भोजन जैसी बुनियादी व्यवस्था भी सुनिश्चित नहीं की जा सकी। आखिर लाखों रुपये के बजट का उपयोग कहां हुआ? खिलाड़ियों की संख्या का आकलन किसने किया? भोजन की जिम्मेदारी किस अधिकारी और एजेंसी की थी? इन सवालों का जवाब देने के लिए जिम्मेदार अधिकारी सामने आने को तैयार नहीं हैं।

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वायरल वीडियो ने खोली बस्तर ओलंपिक की पोल, बच्चों की थाली खाली और जिम्मेदारों की चुप्पी
3 और 4 नवंबर को आयोजित ब्लॉक स्तरीय बस्तर ओलंपिक प्रतियोगिता के दौरान भोजन वितरण की बदहाल तस्वीर सामने आई। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे स्कूली छात्र-छात्राओं को दोपहर के भोजन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। खिलाड़ी थाली लेकर कतार में खड़े रहे, लेकिन कई बच्चों तक भोजन पहुंचने से पहले ही खाना खत्म हो गया। एक खिलाड़ी छात्र ने इस पूरी अव्यवस्था का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किया है। वीडियो में बच्चे भोजन के लिए इंतजार करने और खाना खत्म हो जाने की बात कहते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद आयोजन की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यह कोई सामान्य अव्यवस्था नहीं है। खेल प्रतियोगिता में शामिल होने वाले बच्चे सुबह से मैदान में रहते हैं। शारीरिक मेहनत, दौड़ और खेल गतिविधियों के बीच भोजन उनके लिए बुनियादी जरूरत है। ऐसे में भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होना आयोजन की तैयारी और निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दो लाख से ज्यादा का बजट, फिर खिलाड़ियों की थाली खाली क्यों?
बस्तर ओलंपिक के आयोजन के लिए प्रत्येक ब्लॉक को दो लाख रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध कराए जाने की जानकारी सामने आई है। इस बजट में खिलाड़ियों के भोजन, पेयजल, परिवहन और दूसरी आवश्यक व्यवस्थाओं का खर्च शामिल होना बताया जा रहा है। लेकिन चारामा की तस्वीर सरकारी बजट और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखा रही है। जब 50 से अधिक खिलाड़ियों को भोजन नहीं मिल पाया तो सवाल उठना लाजिमी है कि आयोजन के लिए खिलाड़ियों की वास्तविक संख्या का आकलन किसने किया था? भोजन की मात्रा तय करने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या आयोजन से पहले भोजन व्यवस्था का निरीक्षण किया गया था? बजट आवंटित होने का मतलब सिर्फ सरकारी कागजों में व्यवस्था पूरी होना नहीं है। खिलाड़ियों तक सुविधा पहुंचना भी जरूरी है।अब प्रशासन को आयोजन में खर्च की गई राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए। भोजन के बिल, भुगतान की जानकारी, भोजन तैयार करने वाली एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है। हालांकि बजट के दुरुपयोग का आरोप अभी प्रमाणित नहीं हुआ है।
खेल विभाग की जिम्मेदारी आखिर किसकी? आयोजन में जवाबदेही तय करेगा कौन?
बस्तर ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन में खिलाड़ियों की संख्या के अनुसार भोजन और पेयजल की व्यवस्था करना आयोजन समिति तथा संबंधित विभागों की जिम्मेदारी होती है। इसके बावजूद यदि दर्जनों बच्चे भोजन से वंचित रह गए तो यह सिर्फ भोजन की कमी नहीं, बल्कि आयोजन की निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है। सवाल खेल विभाग से भी है कि ब्लॉक स्तरीय प्रतियोगिता की तैयारियों की समीक्षा किस स्तर पर हुई? क्या अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया था? क्या खिलाड़ियों की उपस्थिति के अनुसार भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी? सरकार एक तरफ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए बड़े आयोजन कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे आयोजन में बच्चों को भोजन तक नहीं मिलना सरकारी दावों की गंभीर परीक्षा है।
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कलेक्टर और जिला CEO से संपर्क की कोशिश, फोन तक नहीं उठा रहे जिम्मेदार!
मामले की गंभीरता को देखते हुए इस संबंध में जनपद पंचायत चारामा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका पक्ष नहीं मिल सका। इसके अलावा जिला कलेक्टर और जिला पंचायत CEO से भी टेलीफोन के माध्यम से संपर्क कर मामले में उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने फोन रिसीव नहीं किया। जब बच्चों के पेट का सवाल हो, तब प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में आती है। आखिर जिले के इतने बड़े आयोजन में खिलाड़ियों को भोजन नहीं मिलने की शिकायत पर जवाबदेही किसकी है? क्या जिला प्रशासन को इस मामले की जानकारी नहीं है या जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई? फिलहाल संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने नहीं आया है। उनका जवाब मिलने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए।
सरकार के खेल प्रोत्साहन के दावों को चारामा की अव्यवस्था ने कटघरे में खड़ा किया
बस्तर ओलंपिक का उद्देश्य केवल प्रतियोगिताएं आयोजित करना नहीं, बल्कि बस्तर के ग्रामीण और आदिवासी युवाओं को खेल के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। इसके माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को पहचान देने और उन्हें बड़े मंच तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन जिस आयोजन में खिलाड़ियों को भोजन जैसी मूलभूत सुविधा के लिए इंतजार करना पड़े, वहां खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के सरकारी दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बच्चे किसी सरकारी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा दिखाने और खेल में आगे बढ़ने की उम्मीद लेकर पहुंचे थे। उन्हें सम्मान, सुविधा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, न कि खाली पेट घर लौटने की नौबत।
कलेक्टर से जांच की मांग, उठ रहे ये 5 बड़े सवाल
चारामा में सामने आई भोजन व्यवस्था की अव्यवस्था के बाद जिला प्रशासन से इन बिंदुओं पर जवाब मांगा जाना चाहिए:
बस्तर ओलंपिक के लिए आवंटित दो लाख रुपये से अधिक की राशि का मदवार हिसाब क्या है?
50 से अधिक खिलाड़ियों को भोजन नहीं मिलने की जिम्मेदारी किस अधिकारी या एजेंसी की है?
खिलाड़ियों की वास्तविक संख्या के अनुसार भोजन की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
भोजन वितरण, भुगतान और बिल-वाउचर की निष्पक्ष जांच कब होगी?
लापरवाही प्रमाणित होने पर संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसी पर क्या कार्रवाई होगी?
अब देखना होगा, जांच होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
चारामा का यह मामला सिर्फ एक ब्लॉक स्तरीय प्रतियोगिता की अव्यवस्था नहीं, बल्कि सरकारी आयोजनों में जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। वायरल वीडियो में सामने आई खिलाड़ियों की शिकायतों को जिला प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए। कलेक्टर को तत्काल जांच के निर्देश देकर भोजन व्यवस्था, आवंटित बजट, भुगतान और आयोजन समिति की भूमिका की पड़ताल करानी चाहिए। यदि लापरवाही प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। खेल प्रतिभाओं को मंच देने के नाम पर आयोजन करना आसान है, लेकिन उन खिलाड़ियों की बुनियादी जरूरतें पूरी करना प्रशासन की असली जिम्मेदारी है। चारामा में अब सवाल सिर्फ भोजन का नहीं, सरकारी जवाबदेही का है।




















