नोटिस पहले या गिरफ्तारी? आकृति केस में पुलिस की कार्रवाई पर कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल

आकृति चौधरी अप्रैल में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में हिरासत में थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत की प्रक्रिया में कई खामियां पाईं। अदालत ने नोएडा के डीएम को आकृति को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। पुलिस ने उन पर प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगजनी के लिए उकसाने का आरोप लगाया था।
हाईकोर्ट ने हिरासत की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
आकृति चौधरी की हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की बेंच ने उनकी गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया की जांच की। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत जारी नोटिसों और पुलिस की कार्रवाई में कई खामियां पाईं। बेंच ने पाया कि उनकी हिरासत जिस आधार पर की गई, वह राज्य की ओर से पेश की गई एक गढ़ी हुई कहानी पर आधारित थी। अदालत ने निर्देश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। इस फैसले की पुष्टि आकृति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस के साथ पैरवी कर रहे अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने भी की है।
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पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश
अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने बताया कि अदालत ने आकृति की गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर राज्य के दावे में बड़ी विसंगतियां पाईं। उनके मुताबिक, अदालत ने नोएडा के जिलाधिकारी को आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने को कहा है। आकृति के वकील माणिक गुप्ता ने बताया कि अदालत के आदेश के अनुसार डीएम से लेकर एसएचओ तक उनकी हिरासत में शामिल अधिकारियों के वेतन से पांच लाख रुपये काटकर मुआवजे के तौर पर आकृति को दिए जाएंगे। हालांकि, अदालत का विस्तृत आदेश अभी सामने आना बाकी है। ऐसे में मुआवजे और अधिकारियों से वसूली की प्रक्रिया की पूरी तस्वीर विस्तृत आदेश आने के बाद स्पष्ट होगी।
पुलिस के आरोपों और नोटिस पर भी सवाल
अप्रैल में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में आकृति चौधरी समेत कई एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया गया था। औद्योगिक और ठेका श्रमिक वेतन बढ़ाने और पड़ोसी हरियाणा में दिए जाने वाले वेतन के बराबर मजदूरी की मांग कर रहे थे। 13 अप्रैल को प्रदर्शन हिंसक हो गया था और सड़कें जाम कर दी गई थीं। इसके करीब एक महीने बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने आकृति पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया और आरोप लगाया कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगजनी के लिए उकसाया। पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो सबूत होने का दावा भी किया था।
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जनरल डायरी से सामने आई कार्रवाई की खामी
सुनवाई के दौरान पुलिस ने स्वीकार किया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था। इसके बाद अदालत ने पुलिस की जनरल डायरी तलब की, जिसमें यह बात सामने आई कि नोटिस तैयार किए जाने से पहले ही आकृति को गिरफ्तार कर लिया गया था। अदालत ने यह भी सवाल किया कि क्या गिरफ्तारी से पहले उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था। बेंच ने प्रदर्शनकारियों को उकसाने के आरोपों से जुड़े सबूत भी मांगे। इन प्रक्रियागत खामियों की जांच के बाद अदालत ने आकृति की हिरासत को रद्द करने का फैसला सुनाया।




















