कटनी CSP भूमि सौदा केस में कोर्ट ने खारिज की आरोपी मारूफ अहमद की याचिका, नेहा पच्चीसिया को भी नहीं मिली राहत

कटनी के चर्चित CSP भूमि सौदे और पद के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में कोर्ट ने आरोपी मारूफ अहमद हनफी को बड़ा झटका दिया है। जिला एवं सत्र न्यायालय ने बुधवार को उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई है और आरोपी लगातार फरार चल रहे हैं। ऐसे में जमानत मिलने पर उनके भागने के साथ-साथ गवाहों और सबूतों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पहले भी खारिज हो चुकी हैं जमानत अर्जियां
इस मामले में मुख्य आरोपी CSP नेहा पच्चीसिया और कथित मुख्य फाइनेंसर क्षितिज राज बारापात्रे की जमानत अर्जियां भी कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। सुनवाई के दौरान मारूफ हनफी के वकील प्रसन्नकांत चतुर्वेदी ने BNSS की धारा 482 के तहत अपना पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने दलील दी कि 92 लाख रुपये के बकाया भुगतान को लेकर यह मूल रूप से सिविल विवाद है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक मामला बनाया गया है।
उम्र और बीमारी का दिया हवाला
बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि मारूफ अहमद हनफी की उम्र 75 साल है और वह कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। उनके खिलाफ पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। वकील ने यह भी दलील दी कि अप्रैल 2026 में हुई रजिस्ट्री को लेकर एफआईआर 19 अगस्त 2026 को दर्ज की गई। बचाव पक्ष ने एफआईआर में हुई देरी को भी मामले पर सवाल उठाने वाला आधार बताया।
3 हजार के खाते में आए 15 लाख
मामले में पुलिस और अभियोजन की ओर से मारूफ हनफी की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि वह सिर्फ एक डमी खरीदार थे। SIT जांच रिपोर्ट और केस डायरी के मुताबिक, 1 जुलाई 2026 को मारूफ के बैंक खाते में केवल 3,036 रुपये थे। वहीं, रजिस्ट्री के दिन 15 अप्रैल 2026 को नेहा पच्चीसिया के करीबी बताए जा रहे क्षितिज राज बारापात्रे ने उनके खाते में 15 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे। अभियोजन ने इसी लेनदेन को मारूफ की भूमिका पर सवाल उठाने वाला अहम तथ्य बताया।
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1.07 करोड़ की जमीन 18.20 लाख में दर्ज कराने का आरोप
मामले में आरोप है कि जिस जमीन की सरकारी गाइडलाइन कीमत करीब 82.46 लाख रुपये थी और जिसका सौदा 1.07 करोड़ रुपये में तय हुआ था, उसे कथित पद के दबाव का इस्तेमाल कर सिर्फ 18.20 लाख रुपये में मारूफ हनफी के नाम दर्ज कराया गया। इस मामले में अपराध क्रमांक 738/2026 दर्ज है। पुलिस ने BNS की विभिन्न धाराओं के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(C), 12 और 13 भी लगाई हैं।
कोर्ट ने क्यों नहीं दी अग्रिम जमानत?
सुखलाल मार्को और आपत्तिकर्ता की ओर से अधिवक्ता अवनीश तिवारी ने केस डायरी और SIT की जांच रिपोर्ट पेश करते हुए जमानत का विरोध किया। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम प्रदीप शर्मा (2014) मामले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत एक असाधारण राहत है और इसे हर मामले में नहीं दिया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, जब जांच जारी हो और आरोपी के फरार होने या गवाहों और सबूतों को प्रभावित करने की आशंका हो, तो ऐसी स्थिति में अग्रिम जमानत देने का आधार कमजोर हो जाता है। इसी वजह से मारूफ अहमद हनफी की याचिका खारिज कर दी गई।




















