PU Special :PS Mental Health Survey-मप्र के 81.3% लोग तनाव में, परेशानी में 60.7% परिवार-दोस्तों के भरोसे, 63.8% को सरकारी मानसिक स्वास्थ्य मदद की जानकारी नहीं

पीपुल्स समाचार ने वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के लिए एक हजार लोगों पर सर्वे किया। सर्वे में 81.3% लोगों ने पिछले महीने तनाव या मानसिक दबाव महसूस करने की बात कही। 77.3% की नींद प्रभावित हुई, जबकि 62% ने अकेलापन महसूस किया। 63.8% लोगों को सरकारी मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जानकारी नहीं है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट…
PS Mental Health Survey-मप्र के 81.3% लोग तनाव में, परेशानी में 60.7% परिवार-दोस्तों के भरोसे, 63.8% को सरकारी मानसिक स्वास्थ्य मदद की जानकारी नहीं
फाइल फोटो

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। बढ़ती जिम्मेदारियां, कॅरियर और भागदौड़ भरी जिंदगी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि  दिमाग पर भी पड़ रहा है। पीपुल्स समाचार के वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर एक हजार लोगों पर किए गए सर्वे में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। 81.3% लोगों ने माना कि पिछले एक महीने में उन्हें कभी-कभी या अक्सर लगातार तनाव या मानसिक दबाव महसूस हुआ। 77.3% ने बताया कि तनाव या चिंता के कारण उनकी नींद कभी-कभी या अक्सर प्रभावित हुई। वहीं 60.7% परेशानी में सबसे पहले परिवार या दोस्तों से मदद लेने की बात कहते हैं, जबकि 63.8% को सरकारी मानसिक स्वास्थ्य मदद की जानकारी नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि मानसिक दबाव का असर अब व्यक्ति की नींद, व्यवहार, रुचि और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ रहा है।

अकेलापन भी बन रहा मानसिक दबाव की वजह 

तेजी से बदलती जीवनशैली में लोगों के आसपास भीड़ तो बढ़ रही है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव कम होने का असर भी सामने आ रहा है। सर्वे में 62% लोगों ने माना कि उन्हें कभी-कभी या अक्सर ऐसा लगा कि उनकी परेशानी समझने वाला कोई नहीं है। इनमें 35.7% ने कभी-कभी और 26.3% ने अक्सर ऐसा महसूस किया। यानी अकेलापन भी मानसिक दबाव को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक दिखाई देता है।

तनाव का असर नींद से आगे व्यवहार पर भी

लगातार तनाव शरीर और दिमाग के सामान्य संतुलन को प्रभावित कर सकता है। सर्वे में 77.3% लोगों ने माना कि उनकी नींद कभी-कभी या अक्सर प्रभावित हुई। वहीं 73.6% लोगों ने गुस्सा, चिड़चिड़ापन या बेचैनी बढ़ने की बात कही। इनमें 40.6% ने कभी-कभी और 33% ने अक्सर ऐसा महसूस किया। यह संकेत देता है कि तनाव का असर केवल मानसिक अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में भी दिखाई दे रहा है।

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मदद चाहिए, लेकिन सरकारी सेवाओं का रास्ता नहीं पता

मानसिक परेशानी में व्यक्ति किससे मदद लेता है, यह उसकी आगे की स्थिति पर असर डाल सकता है। सर्वे में 60.7% लोगों ने परिवार या दोस्तों को पहला सहारा बताया। डॉक्टर या मनोचिकित्सक को केवल 13.4% और काउंसलर को 9.8% लोगों ने प्राथमिक मदद के रूप में चुना। दूसरी ओर 63.8% लोगों को यह नहीं पता कि उन्हें सरकारी मानसिक स्वास्थ्य मदद कहां मिलेगी।

पसंदीदा कामों से दूरी भी मानसिक दबाव का संकेत

तनाव बढ़ने पर व्यक्ति उन गतिविधियों से भी दूरी बनाने लगता है जिनमें पहले उसकी रुचि रहती थी। सर्वे में 40.6% लोगों ने माना कि तनाव के चलते पसंदीदा काम में रुचि कम हो गई। जबकि 31.2% ने कहा कि ऐसा कभी-कभी होता है। यानी कुल 71.8% लोगों ने किसी न किसी स्तर पर रुचि कम होने का अनुभव बताया।

सर्वे में लोगों ने क्या कहा...

  1. क्या पिछले महीने आपको लगातार तनाव या मानसिक दबाव महसूस हुआ?
    कभी-कभी — 55.4%
    अक्सर — 25.9%
    कभी नहीं — 18.8%
  2.  क्या तनाव या चिंता से आपकी नींद प्रभावित हुई?
    कभी-कभी — 49.6%
    अक्सर — 27.7%
    कभी नहीं — 22.8%
  3. क्या आपको गुस्सा, चिड़चिड़ापन या बेचैनी पहले से ज्यादा महसूस हुई?
    कभी-कभी — 40.6%
    अक्सर — 33.0%
    नहीं — 26.3%
  4. क्या आपको अपने पसंदीदा कामों में पहले की तुलना में रुचि कम महसूस हुई?
    हां — 40.6%
    कभी-कभी — 31.2%
    नहीं — 28.1%
  5. क्या आपको सरकारी मानसिक स्वास्थ्य मदद/सेवाओं की जानकारी है?
    नहीं — 63.8%
    हां — 36.2%

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विशेषज्ञों केअनुसार क्या करना चाहिए...

लगातार तनाव को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करें

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. राहुल शर्मा का कहना है कि लगातार तनाव को सामान्य जीवन का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि तनाव का असर नींद, व्यवहार, काम में रुचि या सामाजिक संबंधों पर पड़ रहा है और यह स्थिति लगातार बनी रहती है तो व्यक्ति को समय रहते मनोवैज्ञानिक सलाह लेनी चाहिए। परिवार और दोस्तों का सहयोग शुरुआती स्तर पर महत्वपूर्ण है, लेकिन जरूरत होने पर प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना भी उतना ही जरूरी है।

काउंसलिंग को सहज और स्वीकार्य बनाना जरूरी

गांधी मेडिकल कॉलेज के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरुकता केवल बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लोगों को यह समझना जरूरी है कि लंबे समय तक तनाव, नींद में बदलाव, चिड़चिड़ापन, सामाजिक दूरी और पसंदीदा गतिविधियों से अरुचि जैसे बदलावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के साथ शुरुआती स्तर पर काउंसलिंग को भी सहज और स्वीकार्य बनाना जरूरी है।

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इंदौर में 3 साल में मानसिक स्वास्थ्य ओपीडी 85% बढ़ी, जबलपुर में भी 15% उछाल

प्रदेश के प्रमुख शहरों की स्थिति

भोपाल

स्थिति: सरकारी ओपीडी में सालाना 60 से 65 हजार मरीज पहुंचते हैं।

सुविधा :जेपी अस्पताल के टेली-मानस केंद्र, हमीदिया, एम्स और बीएमएचआरसी में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं हैं। मनोचिकित्सकों के पद लगभग भरे हैं, लेकिन क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की कमी है। सीहोर के मानसिक रोग अस्पताल में करीब 80% पद खाली बताए गए हैं। भोपाल में तीन वर्षों में आत्महत्या के प्रयास के 72 मामले सामने आए।

इंदौर

स्थिति: रीजनल मेंटल हॉस्पिटल की ओपीडी 2022-23 में 37,141 से बढ़कर 2025-26 में हर साल करीब 68,700 हो गई।

सुविधा : संभाग के 71 मनोचिकित्सकों में से 63 इंदौर में पदस्थ बताए गए हैं। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की कमी बनी हुई है। टेली-मानस और शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलिंग की सुविधा है।

ग्वालियर

स्थिति: हर साल करीब 55000 मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं।

सुविधा : जेएएच में 13, मानसिक आरोग्यशाला में छह और जिला अस्पताल मुरार में एक डॉक्टर पदस्थ हैं।जेएएच में वरिष्ठ डॉक्टर काउंसलिंग करते हैं। बीते तीन वर्षों में आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के 59 मामले बताए गए हैं। आत्महत्या और प्रयास के कुल आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

जबलपुर

स्थिति: हर साल करीब 54 हजार मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं।

सुविधा : यहां दो-तीन वर्षों में संख्या 15% बढ़ी है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में डॉक्टर व काउंसलर उपलब्ध हैं। आत्महत्या के मामलों का तीन वर्षीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

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मानसिक तनाव बढ़ाने वाली 5 प्रमुख वजहें

  • कंपटीशन — पढ़ाई, परीक्षा और बेहतर प्रदर्शन का लगातार दबाव।
  • करियर — भविष्य और सही करियर चुनने को लेकर चिंता।
  • रोजगार — नौकरी की अनिश्चितता और काम का दबाव।
  • सोशल मीडिया — दूसरों से तुलना और लगातार डिजिटल दबाव।
  • जीवनशैली — नींद, दिनचर्या और सामाजिक दूरी में बदलाव।
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By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...

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