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क्या है MSP ?किसानों के लिए क्यों है जरूरी, जानिए इसे लेकर बार-बार क्यों होता है आंदोलन?

किसान संगठन चाहते हैं कि MSP तय करते समय स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू की जाए। आयोग ने सुझाव दिया था कि MSP फसल की पूरी लागत (C2) से कम से कम 50% अधिक होनी चाहिए। C2 में बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनों का खर्च, जमीन का किराया और परिवार के श्रम की लागत जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं। 
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किसानों के लिए क्यों है जरूरी, जानिए इसे लेकर बार-बार क्यों होता है आंदोलन?
MSP की सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) करता है

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कई दिनों तक चला किसानों का आंदोलन फिलहाल खत्म हो गया है। सरकार ने मूंग की ज्यादा खरीद, ई-टोकन व्यवस्था खत्म करने और अन्य मांगों पर सहमति जताई, जिसके बाद किसान वापस लौटने लगे। लेकिन आंदोलन यहीं नहीं थमा है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने 10 अगस्त को देशभर में जेल भरो, रेल रोको और सड़क रोको आंदोलन का ऐलान किया है। ऐसे में एक बार फिर MSP (Minimum Support Price) यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य चर्चा के केंद्र में है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि MSP क्या है, यह कैसे तय होती है और इसे लेकर किसानों की नाराजगी क्यों खत्म नहीं होती।

MSP क्या होती है?

MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह तय कीमत होती है, जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदने का आश्वासन देती है। इसका मकसद किसानों को बाजार में कीमत गिरने की स्थिति में नुकसान से बचाना है।

उदाहरण के लिए, यदि सरकार गेहूं की MSP 2,500 रुपये प्रति क्विंटल तय करती है और बाजार में इसका भाव 2,200 रुपये रह जाता है, तब भी सरकारी खरीद होने पर किसान को MSP के हिसाब से 2,500 रुपये मिलेंगे। यानी MSP किसानों के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच है।

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आखिर कौन तय करता है MSP?

MSP की सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) करता है। आयोग फसल की लागत, उत्पादन, मांग, बाजार भाव और अन्य आर्थिक पहलुओं का अध्ययन कर अपनी सिफारिश देता है हालांकि अंतिम फैसला केंद्र सरकार लेती है। हर साल बुवाई के मौसम से पहले MSP घोषित की जाती है, ताकि किसान यह तय कर सकें कि उन्हें कौन-सी फसल बोनी है। फिलहाल सरकार 20 से अधिक फसलों पर MSP घोषित करती है। इनमें गेहूं, धान, मक्का, बाजरा, चना, अरहर, मूंग, उड़द, सरसों, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं।

MSP को लेकर किसानों की मांग क्या है?

  • किसानों का कहना है कि केवल MSP घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। उनकी सबसे बड़ी मांग MSP की कानूनी गारंटी है।
  • इसका मतलब यह है कि कोई भी व्यापारी, कंपनी या निजी खरीदार MSP से कम कीमत पर किसानों की फसल नहीं खरीद सके। किसानों का तर्क है कि कई बार सरकार MSP घोषित तो कर देती है, लेकिन सभी किसानों की फसल सरकारी एजेंसियां नहीं खरीद पातीं। ऐसे में उन्हें मजबूरी में अपनी उपज निजी व्यापारियों को कम दाम पर बेचनी पड़ती है।
  • यही वजह है कि किसान संगठन लंबे समय से MSP को कानून का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें: MP Farmers Protest: सरकार के भरोसे के बाद खत्म हुआ किसानों का आंदोलन, कई मांगों पर बनी सहमति!

स्वामीनाथन आयोग का C2+50% फॉर्मूला क्या है?

किसान संगठन चाहते हैं कि MSP तय करते समय स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू की जाए। आयोग ने सुझाव दिया था कि MSP फसल की पूरी लागत (C2) से कम से कम 50% अधिक होनी चाहिए। C2 में बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनों का खर्च, जमीन का किराया और परिवार के श्रम की लागत जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं। किसानों का मानना है कि इससे उन्हें फसल का उचित लाभ मिलेगा।

MSP को लेकर विवाद क्यों होता है?

सरकार का कहना है कि वह हर साल MSP घोषित करती है और बड़ी मात्रा में फसलों की खरीद भी करती है। लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि MSP घोषित होना और हर किसान को MSP मिलना, दोनों अलग बातें हैं। कई राज्यों में सरकारी खरीद केंद्र पर्याप्त नहीं हैं। कई जगह खरीद सीमित होती है या समय पर शुरू नहीं होती। ऐसे में किसान अपनी उपज कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यही कारण है कि MSP हर किसान तक समान रूप से नहीं पहुंच पाती और विवाद लगातार बना रहता है।

किन राज्यों में MSP व्यवस्था मजबूत और कहां कमजोर है?

सरकार पूरे देश में एक जैसी MSP घोषित करती है, लेकिन खरीद की स्थिति राज्यों में अलग-अलग है।

जहां सरकारी खरीद अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है

  1. पंजाब
  2. हरियाणा
  3. मध्य प्रदेश
  4. उत्तर प्रदेश
  5. छत्तीसगढ़
  6. तेलंगाना
  7. आंध्र प्रदेश
  8. ओडिशा

इन राज्यों में कमजोर मानी जाती है MSP

वहीं बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, कई पूर्वोत्तर राज्यों, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में MSP पर खरीद अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है। इन राज्यों में बड़ी संख्या में किसान अपनी फसल स्थानीय व्यापारियों को MSP से कम कीमत पर बेच देते हैं।

सवाल- बिहार का उदाहरण बार-बार क्यों दिया जाता है?

MSP की चर्चा में बिहार का नाम अक्सर आता है, क्योंकि वर्ष 2006 में राज्य में APMC मंडियों को समाप्त कर दिया गया था। इसके बाद MSP घोषित होने के बावजूद बड़ी संख्या में किसानों तक सरकारी खरीद का लाभ नहीं पहुंच पाया। यही वजह है कि बिहार को अक्सर ऐसे राज्य के तौर पर देखा जाता है, जहां MSP का फायदा सीमित किसानों तक ही पहुंचता है।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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