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कचरे से कमाई का जुगाड़! गांव की पन्नी-रेपर पहुंचेंगे मशीन में, कबाड़ से बनेगी प्लास्टिक सीट

610 से ज्यादा गांवों में कचरा प्रबंधन का नया मॉडल, पन्नी-रेपर को सेग्रीगेशन सेंटरों पर रिसाइकिल कर प्लास्टिक सीट में बदला जाएगा; 56 क्लस्टरों के जरिए घर-घर कचरा संग्रहण और जीपीएस से वाहनों की निगरानी होगी।
कचरे से कमाई का जुगाड़! गांव की पन्नी-रेपर पहुंचेंगे मशीन में, कबाड़ से बनेगी प्लास्टिक सीट
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इंदौर। अब गांवों में घर-घर से निकलने वाली पन्नी, प्लास्टिक और चिप्स-बिस्किट के रेपर पंचायतों के लिए सिरदर्द नहीं, बल्कि कमाई का जरिया बनने जा रहे हैं। इंदौर जिले के 610 से अधिक गांवों में कचरा प्रबंधन की तस्वीर बदलने की तैयारी है। इसके लिए करीब 332 ग्राम पंचायतों को 56 क्लस्टरों में बांटकर एजेंसी के माध्यम से सफाई और कचरा संग्रहण की नई व्यवस्था लागू की जाएगी। इस पूरी व्यवस्था की खास बात यह होगी कि घरों से निकलने वाले सूखे कचरे में मौजूद पन्नी और प्लास्टिक रेपर को बेकार समझकर फेंका नहीं जाएगा। इन्हें अलग-अलग एकत्र कर प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाएगा। इसके बाद मशीनों की मदद से प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल कर प्लास्टिक सीट तैयार की जाएगी। तैयार उत्पाद को प्लास्टिक उद्योगों को बेचकर पंचायतों के लिए आय का रास्ता तैयार किया जाएगा।

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अभी खर्चा, आगे कमाई-प्लास्टिक कचरे की बदलेगी किस्मत

अब तक पंचायतों के सामने पन्नी और रेपर जैसे कचरे को उठाने और उसका निपटारा करने की चुनौती रहती थी। इसके लिए पंचायतों को अपनी राशि खर्च करनी पड़ती थी। नई व्यवस्था में इसी कचरे को उपयोगी उत्पाद में बदलने का मॉडल अपनाया जा रहा है। यानी जिस प्लास्टिक को उठाने के लिए पंचायतों को पैसा खर्च करना पड़ता था, वही आगे चलकर राजस्व का जरिया बन सकता है। इससे एक तरफ गांवों में सफाई व्यवस्था मजबूत होने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर कचरा प्रबंधन पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकेगा।

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56 क्लस्टर संभालेंगे 610 से ज्यादा गांव

जिले की करीब 332 पंचायतों और 610 से अधिक गांवों को 56 क्लस्टरों में बांटने की योजना है। एक क्लस्टर में लगभग आठ से 10 गांव शामिल किए जाएंगे। आसपास के एक से चार क्लस्टरों का जिम्मा एक एजेंसी को सौंपा जाएगा।एजेंसी को घर-घर कचरा उठाने के लिए वाहन और कर्मचारी उपलब्ध कराने होंगे। इसके साथ ही ग्रामीणों को कचरा अलग-अलग रखने के लिए जागरूक करना, स्वच्छता गतिविधियां चलाना और स्वच्छता शुल्क की वसूली भी इसी व्यवस्था का हिस्सा होगी।

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बांक-काली बिल्लोद में प्लास्टिक की होगी ‘नई जिंदगी’

प्लास्टिक कचरे के प्रसंस्करण के लिए बांक और काली बिल्लोद में सेग्रीगेशन सेंटर तैयार किए जा रहे हैं। गांवों से एकत्र किया गया सूखा कचरा इन केंद्रों तक पहुंचाया जाएगा।यहां पन्नी, प्लास्टिक और रेपर को अन्य कचरे से अलग किया जाएगा। इसके बाद मशीनों के जरिए प्लास्टिक को प्रोसेस कर सीट तैयार की जाएगी। इस तरह गांवों से निकलने वाला बेकार प्लास्टिक दोबारा उपयोगी उत्पाद में बदल सकेगा।

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गीला-सूखा कचरा अलग, गांव भी होंगे साफ

नई व्यवस्था में ग्रामीणों को सबसे पहले घर से ही कचरे का बंटवारा करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। गीला और सूखा कचरा अलग-अलग रखा जाएगा। सब्जियों के छिलके, भोजन आदि गीले कचरे में जाएंगे, जबकि प्लास्टिक, पन्नी और रेपर जैसे कचरे को सूखे कचरे में रखा जाएगा।इससे कचरे की छंटाई आसान होगी और रिसाइक्लिंग के लिए उपयोगी सामग्री अलग निकालने में सुविधा मिलेगी।

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जीपीएस बताएगा कचरा वाहन कहां पहुंचा

कचरा संग्रहण की व्यवस्था पर निगरानी रखने के लिए वाहनों में जीपीएस सिस्टम लगाया जाएगा। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कचरा उठाने वाला वाहन किस गांव में पहुंचा और उसने निर्धारित क्षेत्र में संग्रहण किया या नहीं।एजेंसी की जिम्मेदारी केवल वाहन भेजने तक सीमित नहीं रहेगी। उसे नियमित कचरा संग्रहण के साथ ग्रामीणों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाने और व्यवस्था से जुड़े अन्य कार्य भी करने होंगे।

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पंचायतों पर घटेगा बोझ, बढ़ सकती है आय

जिला पंचायत सीईओ हिमांशु प्रजापति के अनुसार, प्लास्टिक कचरे का व्यवस्थित उपयोग कर उसे रिसाइकिल किया जाएगा और उससे सीट तैयार की जाएगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता बेहतर करने के साथ पंचायतों के लिए आय का माध्यम तैयार करने का प्रयास है।यदि योजना तय व्यवस्था के मुताबिक जमीन पर उतरी तो गांवों के लिए यह बदलाव केवल सफाई तक सीमित नहीं रहेगा। कचरे को बोझ से संसाधन और प्लास्टिक को कबाड़ से उत्पाद में बदलने का मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की दिशा बदल सकता है।

Hemant Nagle
By Hemant Nagle

हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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