ट्रंप ने पाकिस्तान को दिखाया ठेंगा !अमेरिका-ईरान बातचीत में मुनीर-शहबाज का नाम गायब

अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बातचीत की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं, लेकिन इस बार पाकिस्तान की भूमिका को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं। इसकी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ताजा बयान है, जिसमें उन्होंने बातचीत की पहल में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर की भूमिका का खुलकर जिक्र किया, लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान का महत्व पहले जैसा नहीं रहा।
ट्रंप ने क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत दोबारा शुरू कराने की कोशिश उनके कहने पर हो रही है। उन्होंने बताया कि सऊदी अरब, UAE और कतर ने अमेरिका से आग्रह किया था कि वह बड़े सैन्य हमले के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाए। ट्रंप के मुताबिक, मौजूदा वार्ता का मुख्य उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में जहाजों की आवाजाही को सामान्य करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों का समाधान तलाशना है। हालांकि, ईरान ने ट्रंप के इस दावे से असहमति जताई है। तेहरान का कहना है कि फिलहाल उसकी बातचीत सीधे अमेरिका से नहीं, बल्कि ओमान के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात से जुड़े मुद्दों पर हो रही है।
जून में पाकिस्तान निभा चुका है मध्यस्थ की भूमिका
पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बातचीत में पाकिस्तान आधिकारिक मध्यस्थ देशों में शामिल था। उस समय कतर के विदेश मंत्रालय ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह पाकिस्तान की अगुवाई वाली मध्यस्थता का समर्थन कर रहा है। इसके बाद 22 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में अमेरिका और ईरान के साथ पाकिस्तान और कतर दोनों मध्यस्थ पक्ष के रूप में मौजूद थे। उस बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में संभावित राहत और भविष्य की वार्ता के ढांचे पर चर्चा हुई थी।
क्या पाकिस्तान वास्तव में बाहर हो गया है?
डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह अटकलें जरूर लगाई जा रही हैं कि मौजूदा दौर की बातचीत में पाकिस्तान की भूमिका पहले की तुलना में कम हो गई है। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि उसे पूरी तरह मध्यस्थता से बाहर कर दिया गया है।
पाकिस्तान के सामने संतुलन की चुनौती
पाकिस्तान की विदेश नीति इस मुद्दे पर हमेशा संतुलन साधने की कोशिश करती रही है। एक तरफ उसकी सीमा ईरान से लगती है और दोनों देशों के बीच धार्मिक, सामाजिक और भौगोलिक संबंध हैं। दूसरी ओर अमेरिका और सऊदी अरब भी पाकिस्तान के महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहे हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं माना जाता। यही स्थिति उसकी मध्यस्थ भूमिका को भी जटिल बनाती है।
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खाड़ी देशों की भूमिका क्यों हुई मजबूत?
सऊदी अरब, UAE और कतर सीधे इस संकट से प्रभावित हैं। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव का सीधा असर खाड़ी की अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। इसी वजह से इन देशों की कोशिश है कि अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बड़ी जंग न छिड़े। मई में भी इन तीनों देशों ने ट्रंप से सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत को मौका देने की अपील की थी।












