बीमे में बचाए 200 रुपए, अब जेब से जाएंगे 36 लाख

इंदौर - सरकारी विभागों और उपक्रमों में वीआईपी आवागमन के लिए महंगी और लग्जरी गाड़ियां खरीदी जाती हैं, लेकिन इनके बीमा में मामूली बचत भी बड़ा नुकसान करा सकती है। ऐसा ही मामला मध्यप्रदेश राज्य खनिज निगम के साथ सामने आया है। वाहन के यात्रियों के बीमा के लिए महज 200 रुपए का अतिरिक्त प्रीमियम नहीं भरने का खामियाजा अब निगम को लाखों रुपए देकर भुगतना पड़ेगा।
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हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश राज्य खनिज निगम की अपील खारिज करते हुए कहा कि केवल व्यापक बीमा पॉलिसी लेने से बीमा कंपनी की जिम्मेदारी असीमित नहीं हो जाती। यदि वाहन मालिक ने यात्रियों के लिए अधिक बीमा कवर का विकल्प चुनने के लिए अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान नहीं किया है, तो बीमा कंपनी को तय सीमा से अधिक मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
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जस्टिस विनय सराफ की कोर्ट ने मामले में बीमा कंपनी की देनदारी प्रति यात्री एक लाख रुपए तक सीमित मानी। कोर्ट के फैसले के बाद मृतक के परिवार को कुल 37.62 लाख रुपए का मुआवजा मिलेगा। इसमें से 1 लाख रुपए बीमा कंपनी और शेष 36.62 लाख रुपए की राशि माइनिंग कॉर्पोरेशन को वहन करनी होगी।
2012 में हुआ था हादसा
मामला 20 फरवरी 2012 का है। मध्यप्रदेश स्टेट माइनिंग कॉर्पोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष गोविंद मालू के साथ रवींद्र शाह सरकारी वाहन से भोपाल जा रहे थे। सीहोर जिले में सफर के दौरान वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया। हादसे में रवींद्र शाह की मौत हो गई। इसके बाद मृतक के परिजनों ने 1.25 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग करते हुए दावा पेश किया था। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने वर्ष 2014 में मामले की सुनवाई करते हुए 28.86 लाख रुपए का मुआवजा निर्धारित किया था।
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यात्रियों के बीमा के लिए दिए थे सिर्फ 200 रुपए
वाहन के बीमा दस्तावेजों की जांच में सामने आया कि माइनिंग कॉर्पोरेशन ने यात्रियों के जोखिम को कवर करने के लिए सिर्फ 200 रुपए का अतिरिक्त प्रीमियम जमा किया था। इस प्रीमियम के आधार पर प्रत्येक यात्री के लिए एक लाख रुपए तक का ही बीमा कवर उपलब्ध था। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी की जिम्मेदारी एक लाख रुपए तक सीमित कर दी थी। शेष मुआवजे का भुगतान वाहन मालिक और चालक की जिम्मेदारी तय की गई थी। कॉर्पोरेशन ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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कोर्ट ने कहा- अतिरिक्त कवर नहीं लिया तो बोझ भी उठाना होगा
हाईकोर्ट ने निगम की दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि वाहन मालिक ने यात्रियों के लिए अधिक या असीमित बीमा कवर हासिल करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान नहीं किया था। ऐसे में दुर्घटना के बाद बीमा कंपनी पर उसकी पॉलिसी की निर्धारित सीमा से ज्यादा भुगतान की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यापक बीमा पॉलिसी का मतलब यह नहीं है कि बीमा कंपनी हर स्थिति में असीमित मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार होगी। बीमा कवर की वास्तविक सीमा पॉलिसी और उसके लिए जमा किए गए प्रीमियम के आधार पर तय होगी।
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28.86 लाख से बढ़कर 37.62 लाख हुआ मुआवजा
मृतक के परिवार की अपील पर हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि में भी बढ़ोतरी की। ट्रिब्यूनल द्वारा तय 28.86 लाख रुपए को बढ़ाकर 37.62 लाख रुपए कर दिया गया। इसके साथ ही इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी लागू रहेगा। ब्याज की गणना हादसे की तारीख से की जाएगी।





















