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CG NEWS: पंडवानी की अमर आवाज थमी: पद्म विभूषण तीजन बाई पंचतत्व में विलीन, राजकीय सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ राष्ट्र ने दी अंतिम विदाई।

पद्म विभूषण तीजन बाई को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई का शनिवार देर रात रायपुर एम्स में निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं और पिछले कई सप्ताह से विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उपचाररत थीं। रविवार सुबह उनका पार्थिव शरीर गनियारी गांव पहुंचा,पूरे राजकीय सम्मान धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
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पंडवानी की अमर आवाज थमी: पद्म विभूषण तीजन बाई पंचतत्व में विलीन, राजकीय सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ राष्ट्र ने दी अंतिम विदाई।

PREM KUMAR,RAIPUR। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की सबसे बुलंद पहचान, पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई अब केवल स्मृतियों और अपनी अमर कला के माध्यम से जीवित रहेंगी। रविवार को उनके पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान, गार्ड ऑफ ऑनर और हजारों लोगों की नम आंखों के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हुआ, लेकिन उनकी आवाज आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर बनकर सदैव गूंजती रहेगी।

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लोक संस्कृति की सबसे बड़ी आवाज हमेशा के लिए खामोश

पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई का शनिवार देर रात रायपुर एम्स में निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं और पिछले कई सप्ताह से विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उपचाररत थीं। रविवार सुबह उनका पार्थिव शरीर गनियारी गांव पहुंचा, जहां पूरे राजकीय सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, गांव बना श्रद्धा का महासागर

गनियारी गांव में सुबह से ही हजारों लोग अपने प्रिय लोक कलाकार की अंतिम झलक पाने के लिए जुटने लगे। आसपास के गांवों, सांस्कृतिक संस्थाओं, कलाकारों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की भारी भीड़ ने तीजन बाई को नम आंखों से विदाई दी। पूरे गांव में शोक का वातावरण था और "तीजन बाई अमर रहें" के स्वर लगातार गूंजते रहे।

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तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर, राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर

तीजन बाई के पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लपेटकर अंतिम यात्रा निकाली गई। पुलिस बल ने पूरे सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया। सलामी के बीच प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर राष्ट्र की ओर से श्रद्धांजलि दी। यह सम्मान केवल एक कलाकार को नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की उस विरासत को था जिसने विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया।

एम्स से गनियारी तक हर पड़ाव पर उमड़ा सम्मान

रायपुर एम्स से पार्थिव शरीर को रवाना करते समय चिकित्सकों, अस्पताल कर्मचारियों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने श्रद्धांजलि दी। गनियारी पहुंचते ही अंतिम दर्शन के लिए लोगों की लंबी कतार लग गई। पूरे मार्ग में ग्रामीणों ने फूल बरसाकर अपनी प्रिय कलाकार को अंतिम प्रणाम किया।

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प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक ने जताया गहरा शोक 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन को भारतीय लोक संस्कृति की अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी को विश्व मंच तक पहुंचाकर भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की आत्मा उनकी आवाज में बसती थी और उनका जाना पूरे राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है।

तीजन बाई का निधन लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति:मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका, पद्मश्री एवं पद्म विभूषण सम्मानित तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि तीजन बाई का निधन न केवल लोककला जगत, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है। मुख्यमंत्री ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति तथा शोकाकुल परिजनों को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।

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पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने साझा की भावुक स्मृतियां

गनियारी पहुंचकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि छात्र जीवन में वे साइकिल चलाकर तीजन बाई की पंडवानी सुनने जाया करते थे। उन्होंने कहा कि तीजन बाई केवल कलाकार नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान थीं। उनकी कला ने प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने दी श्रद्धांजलि

दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह, पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, विधायक ललित चंद्राकर, विधायक डोमलाल कोर्सेवाड़ा सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि तीजन बाई का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेगा।

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साहित्यकारों और कलाकारों ने कहा— यह युग का अंत नहीं, नई शुरुआत है

लोक कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी को केवल कला नहीं रहने दिया बल्कि उसे वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप दिया। उनके अभिनय, गायन और कथावाचन की शैली आने वाली पीढ़ियों के लिए विश्वविद्यालय की तरह रहेगी। उन्होंने संघर्ष को सम्मान में बदलने का इतिहास लिखा।

अलीम बंसी बोले— मां ने जीवनभर सत्य और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया

अलीम बंसी ने भावुक होकर कहा कि बेटे के निधन के बाद तीजन बाई ने उन्हें अपना बेटा माना था। उन्होंने बताया कि तीजन बाई हमेशा कहती थीं कि कभी भी किसी दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर मत चलना। यह सीख आज भी उनके जीवन का सबसे बड़ा मार्गदर्शन है।

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13 वर्ष की उम्र में पहली प्रस्तुति, फिर बदल दिया इतिहास

महज 13 वर्ष की आयु में तीजन बाई ने पहला सार्वजनिक मंच संभाला। उस दौर में महिलाएं बैठकर वेदमती शैली में पंडवानी गाती थीं, लेकिन उन्होंने परंपरा तोड़ते हुए पुरुषों की कापालिक शैली अपनाई। इसके बाद पंडवानी का इतिहास ही बदल गया।

नाना से मिली प्रेरणा, संघर्ष से बनी विश्व की पहचान

24 अप्रैल 1956 को गनियारी में जन्मी तीजन बाई को महाभारत सुनाने की प्रेरणा उनके नाना ब्रजलाल से मिली। समाज के विरोध, आर्थिक तंगी और बहिष्कार के बावजूद उन्होंने अपनी कला नहीं छोड़ी। यही संघर्ष उन्हें विश्व मंच तक ले गया।

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स्कूल नहीं गईं, फिर भी चार विश्वविद्यालयों ने दी डी.लिट.

तीजन बाई औपचारिक शिक्षा से वंचित रहीं, लेकिन उनकी कला ने उन्हें देश-विदेश के विश्वविद्यालयों तक पहुंचाया। उन्हें चार बार डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी.लिट.) की मानद उपाधि प्रदान की गई।

पद्मश्री से पद्म विभूषण तक सम्मान का स्वर्णिम सफर

भारतीय लोककला में अप्रतिम योगदान के लिए तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनके नाम अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान दर्ज हैं, जिन्होंने पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई।

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एम्स से अंतिम विदाई तक: सम्मान का अभूतपूर्व दृश्य

रायपुर एम्स में भर्ती रहने के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी। उनके निधन की सूचना मिलते ही अस्पताल परिसर में शोक की लहर दौड़ गई। इसके बाद प्रशासन ने पूरे राजकीय सम्मान की तैयारी की। पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया। पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। अंतिम यात्रा में प्रशासन, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, साहित्यकार, रंगकर्मी, लोक कलाकार, सामाजिक संगठनों के सदस्य और हजारों नागरिक शामिल हुए। यह दृश्य केवल एक अंतिम संस्कार नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना का सामूहिक सम्मान बन गया।

तीजन बाई : संक्षिप्त जीवनी

तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में पारधी समुदाय में हुआ। बचपन में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनीं और वहीं से पंडवानी के प्रति लगाव पैदा हुआ। समाज के विरोध, आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक बहिष्कार के बावजूद उन्होंने पंडवानी गायन नहीं छोड़ा। वे पहली महिला बनीं जिन्होंने कापालिक शैली में खड़े होकर पंडवानी प्रस्तुत की। उन्होंने भारत सहित अनेक देशों में प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर बनी रहेगी।

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विस्तृत जीवनी

पूरा नाम: तीजन बाई, जन्म: 24 अप्रैल 1956, जन्मस्थान: गनियारी, भिलाई छत्तीसगढ़, समुदाय: पारधी

लोककला: पंडवानी महाभारत कथागायन, पहली प्रस्तुति: 13 वर्ष की उम्र में, विशेष उपलब्धि: कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली प्रमुख महिला कलाकार, सम्मान: पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, चार मानद डी.लिट.,निधन: 5 जुलाई 2026, रायपुर एम्स, विरासत: छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली महान लोकगायिका

Prem Nirmalkar
By Prem Nirmalkar
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