CG NEWS: मुंगेली की 110 साल पुरानी 'पुत्रीशाला' बनी बेटियों की शिक्षा की पहचान, चार पीढ़ियों की यादों को आज भी संजोए है ऐतिहासिक स्कूल

1918 में दानवीर रामप्रसाद साव ने रखी थी नींव, आज भी पूर्व छात्राएं अपने बच्चों और नाती-नातिनों को दिखाने पहुंचती हैं अपनी पहली पाठशाला मुंगेली में स्थापित ऐतिहासिक पुत्रीशाला 108 वर्षों से बेटियों की शिक्षा की विरासत को संजोए हुए है। अंग्रेजी शासनकाल में स्थापित इस विद्यालय का नाम उसी समय "पुत्रीशाला" रखा गया था, जो आज तक बरकरार है।जानिए इस स्कूल का गौरवशाली इतिहास।
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मुंगेली की 110 साल पुरानी 'पुत्रीशाला' बनी बेटियों की शिक्षा की पहचान, चार पीढ़ियों की यादों को आज भी संजोए है ऐतिहासिक स्कूल

SUSHIL SHUKLA, MUNGELI मुंगेली शहर के बीचों-बीच स्थित ऐतिहासिक पुत्रीशाला केवल एक प्राथमिक विद्यालय नहीं, बल्कि बेटियों की शिक्षा की 100 से अधिक वर्षों पुरानी विरासत का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 1918 में स्थापित इस विद्यालय से हजारों छात्राएं शिक्षा लेकर समाज में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। नए शिक्षा सत्र के साथ एक बार फिर विद्यालय परिसर बच्चों की चहल-पहल से गुलजार है, वहीं पूर्व छात्राएं आज भी इस विद्यालय से जुड़ी अपनी यादों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में गर्व महसूस करती हैं।


1918 में रखी गई थी बेटियों की शिक्षा की मजबूत नींव

मुंगेली के दानवीर रामप्रसाद साव द्वारा वर्ष 1918 में बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित पुत्रीशाला आज भी शहर की ऐतिहासिक पहचान बनी हुई है। अंग्रेजी शासनकाल में स्थापित इस विद्यालय का नाम उसी समय "पुत्रीशाला" रखा गया था, जो आज तक बरकरार है।

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नया शिक्षा सत्र... फिर गूंजने लगी बच्चों की किलकारियां

गर्मी की छुट्टियों के बाद जैसे ही नया शिक्षा सत्र शुरू हुआ, विद्यालय परिसर फिर से विद्यार्थियों की चहल-पहल से गुलजार हो गया। पुराने भवन की ऐतिहासिक छवि आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

पूर्व छात्राओं के लिए भावनाओं का तीर्थ बना विद्यालय

शादी के बाद दूसरे शहरों में रहने वाली महिलाएं जब मायके लौटती हैं तो मां महामाया मंदिर के दर्शन के साथ इस विद्यालय में भी जरूर पहुंचती हैं। कई बुजुर्ग महिलाएं अपने बच्चों और नाती-नातिनों को यहीं पढ़ने की यादें सुनाकर भावुक हो जाती हैं।

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90 साल की उम्र में भी ताजा हैं स्कूल की यादें

करीब 90 वर्षीय सरला शुक्ला बताती हैं कि उनके परिवार की कई पीढ़ियों ने इसी विद्यालय में पढ़ाई की। वहीं 80 वर्षीय कंचनलता जैन ने विद्यालय के पुराने स्वरूप, खपरैल वाले कमरों, लकड़ी की जालियों और बीच में बने खेल मैदान की यादें साझा कीं।

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ऐतिहासिक भवन की पहचान आज भी कायम

विद्यालय का मुख्य द्वार आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है। मंदिर शैली के तीन गुंबद इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। परिसर में स्थित एक प्राचीन समाधि स्थल भी लोगों की आस्था का केंद्र माना जाता है।

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300 से 500 छात्राओं से गुलजार रहता था परिसर

पूर्व प्रधानाध्यापिका चंद्रमुखी अग्रवाल के अनुसार एक समय विद्यालय में 14 से 16 शिक्षकों का स्टाफ कार्यरत था और 300 से 500 छात्राएं अध्ययन करती थीं। यह शहर का सबसे बड़ा कन्या प्राथमिक विद्यालय माना जाता था।

1926 से सुरक्षित हैं स्कूल के ऐतिहासिक रिकॉर्ड

विद्यालय में वर्ष 1926 से छात्राओं के प्रवेश संबंधी रिकॉर्ड आज भी सुरक्षित हैं। इनमें नेम कुंवर बाई, त्रिवेणी बाई, तारा बाई, गौरा बाई, रज्जो बाई सहित अनेक छात्राओं के नाम दर्ज हैं।

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संविलयन के बाद घटी छात्राओं की संख्या

वर्ष 2008 में विद्यालय का संविलयन किए जाने के बाद यहां बालिकाओं की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी। इसके बावजूद यह विद्यालय आज भी मुंगेली की बेटियों की शिक्षा का गौरवशाली प्रतीक बना हुआ है।

Prem Nirmalkar
By Prem Nirmalkar
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