CG NEWS:आजादी के 79 साल बाद भी पुल का इंतजार: बारिश आते ही 'टापू' बन जाते हैं अंतागढ़ के चार आदिवासी गांव

कांकेर के अंतागढ़ स्थित एडानार पंचायत में आजादी के 79 साल बाद भी नदी पर पुल नहीं बन पाया है। बारिश में चार आदिवासी गांव बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवागमन पर गंभीर असर।ग्रामीणों ने सरकार से स्थायी समाधान की लगाई गुहार।पंचायत के अंतर्गत आने वाले मलमेटा, मसपुर, गुड़रापारा और स्कूलपारा गांवों के ग्रामीण वर्षों से नदी पर स्थायी पुल बनने का इंतजार कर रहे हैं।
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आजादी के 79 साल बाद भी पुल का इंतजार: बारिश आते ही 'टापू' बन जाते हैं अंतागढ़ के चार आदिवासी गांव

BHUPENDRA SHANDIYA। कांकेर जिले के अंतागढ़ विकासखंड की ग्राम पंचायत एडानार आजादी के 79 वर्ष बाद भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है। पंचायत के चार आश्रित आदिवासी गांव हर बारिश में नदी के कारण बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। पुल नहीं होने से मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है और ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है। वर्षों से उठ रही पुल निर्माण की मांग अब भी अधूरी है।

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79 साल बाद भी अधूरा सपना

कांकेर जिले के अंतागढ़ मुख्यालय से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत एडानार आज भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह नहीं जुड़ सकी है। पंचायत के अंतर्गत आने वाले मलमेटा, मसपुर, गुड़रापारा और स्कूलपारा गांवों के ग्रामीण वर्षों से नदी पर स्थायी पुल बनने का इंतजार कर रहे हैं।

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बारिश बनती है सबसे बड़ी परीक्षा

मानसून शुरू होते ही नदी उफान पर आ जाती है और चारों गांव बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं। कई दिनों तक लोगों का आवागमन बंद हो जाता है, जिससे दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है।

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पढ़ाई पर पड़ता है गहरा असर

गांव में केवल आठवीं तक की पढ़ाई की सुविधा है। आगे की शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को दूसरे गांव जाना पड़ता है, लेकिन पुल नहीं होने से बरसात में स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है। कई बच्चों को गांव छोड़ना पड़ता है, जबकि कुछ जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं।

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बीमार पड़े तो जिंदगी भगवान भरोसे

स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीणों को अंतागढ़ या अन्य पंचायतों के अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। बारिश के दौरान मरीजों को अस्पताल पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।

इलाज नहीं मिला, चली गई जान

ग्रामीण बताते हैं कि पिछले वर्ष एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की तबीयत बिगड़ने पर बाढ़ के कारण अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका, जिससे उनकी मौत हो गई। इससे पहले भी नदी पार करते समय एक व्यक्ति की डूबने से जान जा चुकी है।

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ट्रैक्टर ही बना जीवन का सहारा

बारिश के मौसम में गांव तक पहुंचने का एकमात्र विकल्प ट्रैक्टर रह जाता है। ग्रामीण अपने वाहन नदी के दूसरी ओर छोड़कर पैदल या अस्थायी साधनों से गांव तक पहुंचते हैं।

नक्सल असर घटा, अब विकास की उम्मीद

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में नक्सली गतिविधियां कम होने के बाद अब पुल निर्माण में कोई बड़ी बाधा नहीं है। ऐसे में सरकार को प्राथमिकता के आधार पर पुल निर्माण कराना चाहिए।

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ग्रामीणों की दो टूक मांग

ग्रामीणों का कहना है कि पुल केवल एक निर्माण कार्य नहीं बल्कि उनकी जीवनरेखा है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे गांव तक पहुंचेगा।

Prem Nirmalkar
By Prem Nirmalkar
नई दिल्ली
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