Garima Vishwakarma
5 Feb 2026
इंदौर की विशेष सीबीआई अदालत ने सोमवार को मध्य प्रदेश के कुख्यात व्यापमं घोटाले से जुड़े पटवारी भर्ती परीक्षा–2008 के एक अहम मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए फर्जीवाड़े के दोषी पाए गए 10 आरोपियों को पांच–पांच साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने सभी दोषियों पर तीन-तीन हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। अदालत के इस फैसले को उस संगठित अपराध पर करारा तमाचा माना जा रहा है, जिसने वर्षों तक सरकारी भर्तियों की पवित्रता को तार-तार कर दिया और योग्य युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ किया।
व्यापमं घोटाला मध्य प्रदेश के सबसे बड़े और बदनाम भर्ती एवं प्रवेश परीक्षा घोटालों में शुमार रहा है। इस घोटाले में मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा कराई गई परीक्षाओं को सुनियोजित तरीके से भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया था। नकल माफिया, दलालों और फर्जी अभ्यर्थियों के गठजोड़ ने फर्जी दस्तावेजों, नकली प्रमाण पत्रों और अवैध तरीकों से चयन सुनिश्चित किया। जब इस घोटाले का खुलासा हुआ तो न सिर्फ प्रदेश, बल्कि पूरे देश में हड़कंप मच गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए अंततः सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर व्यापमं से जुड़े सभी मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी।
पटवारी भर्ती परीक्षा–2008 में खुला फर्जीवाड़े का खेल
सीबीआई जांच में सामने आया कि वर्ष 2008 में आयोजित पटवारी भर्ती परीक्षा में कई उम्मीदवारों ने जानबूझकर फर्जी प्रमाण पत्र और कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल कर चयन हासिल किया। इस साजिश के चलते न केवल सरकारी सिस्टम को धोखा दिया गया, बल्कि उन हजारों योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का खुला हनन हुआ, जो मेहनत और ईमानदारी के दम पर चयन की उम्मीद लगाए बैठे थे। कोर्ट ने इस मामले में रामेश्वर, राकेश, देवेंद्र, चेतन, बलराम, हरपाल, गोपाल, जितेंद्र, दिनेश और दिग्विजय सिंह सोलंकी को दोषी करार दिया।
खंडवा से शुरू हुआ था केस, सालों बाद मिला इंसाफ
इस संगीन मामले की शुरुआत 26 अक्टूबर 2012 को खंडवा जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से हुई थी। प्रारंभिक जांच के बाद खंडवा पुलिस ने 28 मई 2014 को अदालत में चार्जशीट पेश की थी। इसके बाद वर्षों तक लंबा ट्रायल चला, जिसमें अभियोजन पक्ष ने पुख्ता साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोप साबित किए। कोर्ट ने साफ कहा कि यह महज परीक्षा में गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आपराधिक साजिश थी। अंततः अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष की सश्रम कैद और जुर्माने की सजा सुनाकर यह संदेश दिया कि सरकारी भर्तियों से खिलवाड़ करने वालों को कानून किसी कीमत पर बख्शने वाला नहीं है।